शाबर मंत्र, तंत्र यंत्र साधना, गुरु गोरखनाथ परंपरा के प्राचीन सिद्ध मंत्र, वशीकरण, सुरक्षा मंत्र, बाधा निवारण मंत्र और शक्तिशाली लोकपरंपरा आधारित साधनाओं का संपूर्ण ज्ञान। यहाँ आप सरल मंत्र विधि, प्रयोग, तांत्रिक माध्यम और आध्यात्मिक जानकारी आसानी से सीख सकते हैं।

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मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

Dushth Nivaran Vidhi | Powerful Ganesh Mantra for Protection

दुष्ट-निवारण-विधि : घर-परिवार की सुरक्षा हेतु 

🙏 जब जीवन में नज़र, दुष्ट-प्रभाव, भय, अड़चन या नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाए…
तब यह प्राचीन मंत्र अत्यंत प्रभावी सुरक्षा कवच का कार्य करता है।

Dushth Nivaran Vidhi | Powerful Ganesh Mantra for Protection
Dushth Nivaran Vidhi | Powerful Ganesh Mantra for Protection



🔥 मंत्र:

श्री गणेश-हृदयं हृदयस्थे गणपतये नमः।।
दोष-नाशाय नमः।।
विघ्न-नाशाय नमः।।
सूर्य-चन्द्र-बलाय नमः।।
गुरु-गोरक्षाय नमः।।
भैरवनाथाय नमः।।
नाथ सिद्ध रहो, गणेश सिद्ध रहो।।

🕉 विधि:

• मंगलवार या बुधवार से शुरुआत करें।
• किसी भी नज़र/दुष्ट प्रभाव/टोना/भय/अवरोध में 21 बार मंत्र जप करें।
• घर में चारों दिशा में हाथ घुमाकर शांत मन से यह प्रयोग करें।
• मन शांत रखें और अपने परिवार की रक्षा का संकल्प लें।

🛡 लाभ:

✔ नज़र-दोष से रक्षा
✔ दुष्ट प्रभावों का नाश
✔ भय, अवरोध और चिंता का शमन
✔ घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

🙏 माता-पिता, परिवार व घर की सुरक्षा के लिए इस पोस्ट को शेयर करें। 





रविवार, 13 मार्च 2022

Amalaki ekadashi

 Amalaki ekadashi आमलकी एकादशी

वैदिक ज्योतिष के अनुसार एकादशी व्रत उदया तिथि में रखा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, 13मार्च की सुबह 10 बजकर 21 मिनट से एकाशी प्रारंभ एकादशी तिथि लग गई है। जो कि 14 मार्च को दोपर02 बजकर 45 मिनट तक रहेगी। ऐसे में 14 मार्च को उदया तिथि में ही एकादशी व्रत रखना उत्तम है।

आमलकी एकादशी का शुभ मुहूर्त

एकादशी तिथि प्रारंभ: 13 मार्च सुबह 10 बजकर 21 मिनट से।
एकादशी तिथि समाप्त:  14 मार्च 2022 को सुबह 2 बजकर 45 मिनट तक।
पारण का समय:  15 मार्च 2022को सुबह 6 बजकर 15 मिनट से सुबह 8  बजकर 20 मिनट तक।
 
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Amalaki ekadashi

 

महात्म्य

आमलकी यानी आंवला को शास्त्रों में उसी प्रकार श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है जैसा नदियों में गंगा को प्राप्त है और देवों में भगवान विष्णु को। विष्णु जी ने जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा को जन्म दिया उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को जन्म दिया। आंवले को भगवान विष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया है। इसके हर अंग में ईश्वर का स्थान माना गया है। भगवान विष्णु ने कहा है जो प्राणी स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं उनके लिए फाल्गुन शुक्ल पक्ष में जो पुष्य नक्षत्र में एकादशी आती है उस एकादशी का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है। इस एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है।

आमलकी एकादशी व्रत विधि

स्नान करके भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष हाथ में तिल, कुश, मुद्रा और जल लेकर संकल्प करें कि मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता एवं मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रखता हूं। मेरा यह व्रत सफलता पूर्वक पूरा हो इसके लिए श्री हरि मुझे अपनी शरण में रखें। संकल्प के पश्चात षोड्षोपचार सहित भगवान की पूजा करें।
भगवान की पूजा के पश्चात पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष की पूजा करें। सबसे पहले वृक्ष के चारों की भूमि को साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें। पेड़ की जड़ में एक वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। इस कलश में देवताओं, तीर्थों एवं सागर को आमत्रित करें। कलश में सुगन्धी और पंच रत्न रखें। इसके ऊपर पंच पल्लव रखें फिर दीप जलाकर रखें। कलश के कण्ठ में श्रीखंड चंदन का लेप करें और वस्त्र पहनाएं। अंत में कलश के ऊपर श्री विष्णु के छठे अवतार परशुराम की स्वर्ण मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से परशुराम जी की पूजा करें। रात्रि में भगवत कथा व भजन कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें।
द्वादशी के दिन प्रात: ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा दें साथ ही परशुराम की मूर्ति सहित कलश ब्राह्मण को भेंट करें। इन क्रियाओं के पश्चात परायण करके अन्न जल ग्रहण करें।

आमलकी एकादशी व्रत कथा

अट्ठासी हजार ऋषियों को सम्बोधित करते हुए सूतजी ने कहा - "हे विप्रो! प्राचीन काल की बात है। महान राजा मान्धाता ने वशिष्ठजी से पूछा- 'हे वशिष्ठजी! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो ऐसे व्रत का विधान बताने की कृपा करें, जिससे मेरा कल्याण हो।'
महर्षि वशिष्ठजी ने कहा - 'हे राजन! सब व्रतों से उत्तम और अंत में मोक्ष देने वाला आमलकी एकादशी का व्रत है।'
राजा मान्धाता ने कहा- 'हे ऋषिश्रेष्ठ! इस आमलकी एकादशी के व्रत की उत्पत्ति कैसे हुई? इस व्रत के करने का क्या विधान है? हे वेदों के ज्ञाता! कृपा कर यह सब वृत्तांत मुझे विस्तारपूर्वक बताएं।'
महर्षि वशिष्ठ ने कहा- 'हे राजन! मैं तुम्हारे समक्ष विस्तार से इस व्रत का वृत्तांत कहता हूँ- यह व्रत फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में होता है। इस व्रत के फल के सभी पाप समूल नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत का पुण्य एक हजार गौदान के फल के बराबर है। आमलकी (आंवले) की महत्ता उसके गुणों के अतिरिक्त इस बात में भी है कि इसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के श्रीमुख से हुई है। अब मैं आपको एक पौराणिक कथा सुनाता हूँ। ध्यानपूर्वक श्रवण करो-
प्राचीन समय में वैदिक नामक एक नगर था। उस नगर में ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, शूद्र, चारों वर्ण के लोग प्रसन्ततापूर्वक रहते थे। नगर में सदैव वेदध्वनि गूंजा करती थी।
उस नगरी में कोई भी पापी, दुराचारी, नास्तिक आदि न था।
उस नगर में चैत्ररथ नामक चंद्रवंशी राजा राज्य करता था। वह उच्चकोटि का विद्वान तथा धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था, उसके राज्य में कोई भी गरीब नहीं था और न ही कंजूस। उस राज्य के सभी लोग विष्णु-भक्त थे। वहां के छोटे-बड़े सभी निवासी प्रत्येक एकादशी का उपवास करते थे।
एक बार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की आमलकी नामक एकादशी आई। उस दिन राजा और प्रत्येक प्रजाजन, वृद्ध से बालक तक ने आनंदपूर्वक उस एकादशी को उपवास किया। राजा अपनी प्रजा के साथ मंदिर में आकर कलश स्थापित करके तथा धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न, छत्र आदि से धात्री का पूजन करने लगा। वे सब धात्री की इस प्रकार स्तुति करने लगे- 'हे धात्री! आप ब्रह्म स्वरूपा हैं। आप ब्रह्माजी द्वारा उत्पन्न हो और सभी पापों को नष्ट करने वाली हैं, आपको नमस्कार है। आप मेरा अर्घ्य स्वीकार करो। आप श्रीरामचंद्रजी के द्वारा सम्मानित हैं, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, मेरे सभी पापों का हरण करो।'
उस मंदिर में रात को सभी ने जागरण किया। रात के समय उस जगह एक बहेलिया आया। वह महापापी तथा दुराचारी था।
अपने कुटुंब का पालन वह जीव हिंसा करके करता था। वह भूख-प्यास से अत्यंत व्याकुल था, कुष्ठ भोजन पाने की इच्छा से वह मंदिर के एक कोने में बैठ गया।
उस जगह बैठकर वह भगवान विष्णु की कथा तथा एकादशी माहात्म्य सुनने लगा। इस प्रकार उस बहेलिए ने सारी रात अन्य लोगों के साथ जागरण कर व्यतीत की। प्रातःकाल सभी लोग अपने-अपने निवास पर चले गए। इसी प्रकार वह बहेलिया भी अपने घर चला गया और वहां जाकर भोजन किया।
कुछ समय बीतने के पश्चात उस बहेलिए की मृत्यु हो गई।
उसने जीव हिंसा की थी, इस कारण हालांकि वह घोर नरक का भागी था, परंतु उस दिन आमलकी एकादशी का व्रत तथा जागरण के प्रभाव से उसने राजा विदुरथ के यहां जन्म लिया। उसका नाम वसुरथ रखा गया। बड़ा होने पर वह चतुरंगिणी सेना सहित तथा धन-धान्य से युक्त होकर दस सहस्र ग्रामों का संचालन करने लगा।
वह तेज में सूर्य के समान, कांति में चंद्रमा के समान, वीरता में भगवान विष्णु के समान तथा क्षमा में पृथ्वी के समान था। वह अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर और विष्णु-भक्त था। वह प्रजा का समान भाव से पालन करता था। दान देना उसका नित्य का कर्म था।
एक बार राजा वसुरथ शिकार खेलने के लिए गया। दैवयोग से वन में वह रास्ता भटक गया और दिशा का ज्ञान न होने के कारण उसी वन में एक वृक्ष के नीचे सो गया। कुष्ठ समय पश्चात पहाड़ी डाकू वहां आए और राजा को अकेला देखकर 'मारो-मारो' चिल्लाते हुए राजा वसुरथ की ओर दौड़े। वह डाकू कहने लगे कि इस दुष्ट राजा ने हमारे माता-पिता, पुत्र-पौत्र आदि समस्त सम्बंधियों को मारा है तथा देश से निकाल दिया। अब हमें इसे मारकर अपने अपमान का बदला लेना चाहिए।
इतना कह वे डाकू राजा को मारने लगे और उस पर अस्त्र-शस्त्र का प्रहार करने लगे। उन डाकुओं के अस्त्र-शस्त्र राजा के शरीर पर लगते ही नष्ट हो जाते और राजा को पुष्पों के समान प्रतीत होते। कुछ देर बाद प्रभु इच्छा से उन डाकुओं के अस्त्र-शस्त्र उन्हीं पर प्रहार करने लगे, जिससे वे सभी मूर्च्छित हो गए।
उसी समय राजा के शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुई। वह देवी अत्यंत सुंदर थी तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत थी। उसकी भृकुटी टेढ़ी थी। उसकी आंखों से क्रोध की भीषण लपटें निकल रही थीं।
उस समय वह काल के समान प्रतीत हो रही थी। उसने देखते-ही-देखते उन सभी डाकुओं का समूल नाश कर दिया।
नींद से जागने पर राजा ने वहां अनेक डाकुओं को मृत देखा। वह सोचने लगा किसने इन्हें मारा? इस वन में कौन मेरा हितैषी रहता है?
राजा वसुरथ ऐसा विचार कर ही रहा था कि तभी आकाशवाणी हुई- 'हे राजन! इस संसार मे भगवान विष्णु के अतिरिक्त तेरी रक्षा कौन कर सकता है!'
इस आकाशवाणी को सुनकर राजा ने भगवान विष्णु को स्मरण कर उन्हें प्रणाम किया, फिर अपने नगर को वापस आ गया और सुखपूर्वक राज्य करने लगा।
महर्षि वशिष्ठ ने कहा- 'हे राजन! यह सब आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव था, जो मनुष्य एक भी आमलकी एकादशी का व्रत करता है, वह प्रत्येक कार्य में सफल होता है और अंत में वैकुंठ धाम को पाता है'।"

कथा-सार

भगवान श्रीहरि की शक्ति हमारे सभी कष्टों को हरती है। यह मनुष्य की ही नहीं, अपितु देवताओं की रक्षा में भी पूर्णतया समर्थ है। इसी शक्ति के बल से भगवान विष्णु ने मधु-कैटभ नाम के राक्षसों का संहार किया था। इसी शक्ति से उत्पन्ना एकादशी बनकर मुर नामक असुर का वध करके देवताओं के कष्ट को हरकर उन्हें सुखी किया था।


भगवान जगदीश्वर जी की आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ ॐ जय...॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥


शनिवार, 20 मार्च 2021

वानस्पतिक तंत्र

वानस्पतिक तंत्र

नीबू के कुछ चमत्कारी प्रयोग इसका तंत्र में प्रयोग विभिन्न प्रकार के समस्याओं में इस नीबू का उपयोग जिसे आप खुद करके लाभ ले सकते हैं। सदियों से नीबू का प्रयोग कई कई तांत्रिक अभिकर्म टोने टोटको में होता आया है।
यह वानस्पतिक तंत्र के अंतर्गत भी आते हैं।
वानस्पतिक तंत्र
वानस्पतिक तंत्र




1) यदि आप या आपके परिवार में कोई हमेशा अस्वस्थ रहते हो बीमार रहते हों उनको दवा भी नही लग रही तब आप को किसी भी मंगलवार को एक नीबू लेना है।

उसी दिन सन्ध्या गोधूलि बेला के वक्त आप उस नीबू को लेकर पश्चिम दिशा की तरफ मुँह करके खड़े हो जाएं और आपको तीन बार बोलना है।

।ॐ ब्रम्ह ब्रम्ह मंडले नमो नमः।।

उसके बाद उस नीबू को अपने सर से या रोगी के सर से तीन बार घड़ी की सुई की उल्टी दिशा में तीन बार घुमाना है।  नीबू को सर पर से घुमाने के बाद वही उसे जमीन पर रखकर एक ही बार मे काट लेना है एक ही बार मे नीबू दो टुकड़े हो जाने चाहिए। फिर उस कटे नीबू के एक टुकड़े को अपने सामने की ओर और एक टुकड़े को अपने पीछे की ओर फेक देना है। ऐसा लगातार तीन मंगलवार तक करना है फिर इसका रिजल्ट परिणाम आप खुद देखेंगे।

2) जिनके जिन मां बाप के बच्चे उनका कहना न मान रहे हो मनमानी करते फिरते हो तब आप जब भी बच्चे को खाना देते हों।

आप अपने बच्चे को जब थाली में खाना खाने को परोसते हो उस वक्त उनके थाली के नीचे नीबू के पांच बीज रख दें
यह प्रयोग आप किसी भी गुरुवार को करें। और जब बच्चा खाना खा कर उठ जाए तब उस नीबू के बीज को वहां से उठा कर किसी केले के पेड़ नीचे दबा दें और दबा कर यह बोलना है। हे गुरुदेव आप मेरे बच्चे के अंदर अच्छे अच्छे गुण भर दें उसके अंदर सदाचार और सद्भावना विकसित करें। ऐसा आपको तीन गुरुवार लगातार करना है फिर आप देखेंगे इस प्रयोग का असर।।।।

3) यदि आपको कोई अनजाने भय सताते हो बुरे सपने यदि आपको अक्सर आते हो आपका मन अशांत रहता हो तब आप किसी पूर्णमासी के दिन रात दस बजे अपने बेडरूम में यह प्रयोग करें।

आप रात दस बजे एक हरा नीबू ले साथ ही पांच इलायची छोटी व पांच कपूर ले अब कपूर व इलायची को एक साफ सुथरी कटोरी में रसखकर जला ले। उसे जलाने के बाद नीबू अपने सर से पैर तक साथ बार उतारा करे फिर नीबू को काट कर उसी जली हुई कपूर इलायची में पूरा निचोड़ दें। और इन सब को ले जाकर किसी चौराहे पर फेंक आये इस प्रयोग को आपको सिर्फ एक ही बार करना है।

4) जिन मां बाप के बच्चों की पढ़ाई में मन न लगते हो एकाग्रता की उनमे बहुत कमी देखने को मिलते हो तो ऐसे में यह प्रयोग आपको करना है।

किसी भी सोमवार को आपको एक नीबू लेना है उस नीबू को काटकर एक कटोरी में निचोड़ लेना है फिर एक छोटा टुकड़ा कपड़े का उस नीबू के रस से भिगो लेना है। कपड़े भिगो लेने के बाद उसे धूप में सुखा लेना है उसे धूप में सुखा लेने के बाद थोड़ी सी सरसो के तेल में उसे डुबाकर डीप कर लेना है। और उसे बाती बना लेना बाती बनाकर उस बच्चे के सर पर से पांच बार घड़ी की सुई की उल्टी दिशा घुमाकर फिर उस बाती को घर पर ही किसी कोने में जला दें। उस बाती के जले हुए राख को रात को किसी चौराहे पर ही जाकर फेक आना फिर देखना इस प्रयोग का कैसा ।।मन जबरदस्त परिणाम आपको दिखने को मिलेगा।।

5) बहुत से लोगों का यह कहना होता है कि किसी ने हमपर कुछ करा रखा है हमपर जरूर किया कराया हुआ है हमपर जादू टोने मैली विद्या का प्रयोग किया गया है।

जिन पर तंत्र मंत्र की बाधा हो किये कराए हो जिन पर अमल काला जादू कर दिया गया हो वे लोग इस उपाय को करें। किसी भी मंगलवार के दिन ब्रम्हमुहूर्त में एक नीबू ले कर हनुमान जी के मंदिर में जाना है । मन्दिर में जाकर उस नीबू से हनुमान जी का सात बार उतारा करना नीबू फेरना है उनका उतारा करना है। उतारा करते वक्त हनुमान जी से अपनी समस्याएं मन ही मन बोल दे। फिर आप उस नीबू को ले कर पूरे मन्दिर की पांच परिक्रमा करें फिर  मन्दिर के पिछवाड़े खड़े हो अपने पर ऊपर से नीचे सात बार उतारा करें फिर नीबू को काटकर उस पर दो कपूर जला कर सीधे घर आ जाएं।

यह प्रयोग भी एक ही बार करें और आप इसका असर आप प्रत्यक्ष देख पाएंगे।



शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

Nath Panthiy Totke

 नाथ-पन्थीय टोटके


  1. चूहे का उपद्रव बन्द करना : ऊँट के बाएँ पैर का नाखून अनुराधा, पुष्य या उत्तरा नक्षत्र में लाकर घर में जलाएं। सभी चूहे भाग जाएंगे।
    Nath Panthiy Totke
    Nath Panthiy Totke

  2. खोए पशु हेतु : गाय, भैंस, बकरी आदि पशु खो जाय या रास्ता भूल कर घर तक न आए, तो जहाँ उसे बांधा जाता है, वहाँ की रस्सी में लोहे का चम्मच बाँध दे। इससे पशु कितनी भी दूर हो, अवश्य वापस आएगा। हाँ, कहीं किसी ने उसे बाँध कर न रखा हो।
  3. दांत का दर्द : करवन्दी (काली मैना, डोंगर मैना) की जड़ पानी में पीस कर उसका लेप दाँतों पर करे या दांतों से जड़ को चबाते हुए कुछ समय तक उसका रस दाँतों पर रहने दे। इससे दांतों का दर्द दूर होगा। दाँतों में सड़न हुई हो, तो भी यह उपाय लाभ-प्रद होगा।
  4.  सर्प को भगाना : अच्छी 'हींग' और 'वेखण्ड' पानी में पीस कर हाथ में लगा ले । इस हाथ से झटके के साथ सर्प की गर्दन पकड़े और उसे कहीं दूर छोड़ आए। उक्त लेप से सर्प - दंश नहीं करता।
  5.  सांप के काट लेने पर : कड़वे 'दोडके' के फल का काढ़ा बनाकर शुद्ध घी के साथ पिलाने से सर्प - दंश का विष उतर जाता है या उक्त फल के अन्दर की जाली पानी में पीस कर इस पानी को दंश-पीड़ित को पिलाए।
  6. सर्प-दंश से रक्षा : श्वेत गुजा की जड़ ग्रहण-काल में ले आए। धूप देकर ताबीज में बन्द कर धारण करे । सर्प-दंश का भय नहीं रहेगा।
  7.  मिरगी, चक्कर आदि का निवारण : काले धतूरे का रस ६ माशा तिली के ६माशे तेल में मिलाकर मिरगी, चक्कर आदि आने पर रोगी को पिलाए । आराम होगा।

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

नौकरी-प्राप्ति-मन्त्र

 नौकरी-प्राप्ति-मन्त्र 


कई लोग अपनी उच्च पढ़ाई करके भी नौकरी को लगने की बजाय घर पर ही बैठे रहते है. उनकी और से पूरी मेहनत करके भी हर टेस्ट में जैसे की नौकरी पाने के लिए परीक्षा ये होती है उनमे असफल होते है. ज्यादातर ऐसा होने के कई कारन होते है जैसे की आपके पढ़ाई में कमी या फिर अगर आपने दिलो जान से पढ़ा है फिर भी असफल हो रहे हो तो आपको किसी ग्रह का बुरा असर भी हो सकता है. या फिर आप भगवान् को दिलसे याद नहीं करते होंगे 



कई लोगो को नौकरी होने के बाद बहुत सालो से उनका प्रमोशन नही होता. उन्होंने कड़ी मेहनत करने के बावजूत भी उनका प्रमोशन नहीं होता इस सब के लिए आपके ग्रह उचित स्थान पर नहीं होंगे तो इसके लिए आपको आज हम नौकरी पाने का मंत्र आपको बताने जा रहे है .

प्रार्थना-


हे कामाक्षा ! हे शिव-शक्ति ! करते हैं हम भक्ति।

सुन लो भक्त की पुकार, बेड़ा है मझधार ॥ 

चलाकर पतवार, लगा दो मां! पार । 

तुम्हें शङ्कर की आन, सत-गुरु का कहना मान ॥

सहारा दे दो मां, हम हो रहे बेकार। निराशा का अन्धकार, दूर है किनार ॥

 दया - दृष्टि फेरो अम्ब ! बेड़ा करो पार । दोहाई है, दोहाई है, तुम्हारे चरणों में माई !

दोहाई कामरूप दानी की, दोहाई हाड़ी दासी की।

 

मन्त्र-

नमः कामाक्षा ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा ।।


विधि : 

शनिवार को शनि देव की पूजा कर उक्त प्रार्थना कर मन्त्र 108 बार जपे। इसके बाद गो-माता को गुड़ खिलाकर गाय के गोबर का उपला बनाए। उसे दिन भर सुखाए और रात को जलाए । जब तक वह उपला जलता रहे, तब तक उक्त मन्त्र पढ़ता रहे। उपला जब जल कर भस्म हो जाए, तब उसे उठाकर मिट्री के नए पात्र में रख दे। बाद में जब नौकरी, व्यापार या किसी कार्य के लिए यात्रा करनी हो, तो इस भस्म में से एक चुटकी लेकर, उसे उक्त मन्त्र से 7 बार अभिमन्त्रित कर, ललाट पर तिलक लगाए। इससे कार्य  में अवश्य सफलता प्राप्त होगी।


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