शाबर मंत्र, तंत्र यंत्र साधना, गुरु गोरखनाथ परंपरा के प्राचीन सिद्ध मंत्र, वशीकरण, सुरक्षा मंत्र, बाधा निवारण मंत्र और शक्तिशाली लोकपरंपरा आधारित साधनाओं का संपूर्ण ज्ञान। यहाँ आप सरल मंत्र विधि, प्रयोग, तांत्रिक माध्यम और आध्यात्मिक जानकारी आसानी से सीख सकते हैं।

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मंगलवार, 9 दिसंबर 2025

Dushth Nivaran Vidhi | Powerful Ganesh Mantra for Protection

दुष्ट-निवारण-विधि : घर-परिवार की सुरक्षा हेतु 

🙏 जब जीवन में नज़र, दुष्ट-प्रभाव, भय, अड़चन या नकारात्मक ऊर्जा बढ़ जाए…
तब यह प्राचीन मंत्र अत्यंत प्रभावी सुरक्षा कवच का कार्य करता है।

Dushth Nivaran Vidhi | Powerful Ganesh Mantra for Protection
Dushth Nivaran Vidhi | Powerful Ganesh Mantra for Protection



🔥 मंत्र:

श्री गणेश-हृदयं हृदयस्थे गणपतये नमः।।
दोष-नाशाय नमः।।
विघ्न-नाशाय नमः।।
सूर्य-चन्द्र-बलाय नमः।।
गुरु-गोरक्षाय नमः।।
भैरवनाथाय नमः।।
नाथ सिद्ध रहो, गणेश सिद्ध रहो।।

🕉 विधि:

• मंगलवार या बुधवार से शुरुआत करें।
• किसी भी नज़र/दुष्ट प्रभाव/टोना/भय/अवरोध में 21 बार मंत्र जप करें।
• घर में चारों दिशा में हाथ घुमाकर शांत मन से यह प्रयोग करें।
• मन शांत रखें और अपने परिवार की रक्षा का संकल्प लें।

🛡 लाभ:

✔ नज़र-दोष से रक्षा
✔ दुष्ट प्रभावों का नाश
✔ भय, अवरोध और चिंता का शमन
✔ घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार

🙏 माता-पिता, परिवार व घर की सुरक्षा के लिए इस पोस्ट को शेयर करें। 





रविवार, 13 मार्च 2022

Amalaki ekadashi

 Amalaki ekadashi आमलकी एकादशी

वैदिक ज्योतिष के अनुसार एकादशी व्रत उदया तिथि में रखा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, 13मार्च की सुबह 10 बजकर 21 मिनट से एकाशी प्रारंभ एकादशी तिथि लग गई है। जो कि 14 मार्च को दोपर02 बजकर 45 मिनट तक रहेगी। ऐसे में 14 मार्च को उदया तिथि में ही एकादशी व्रत रखना उत्तम है।

आमलकी एकादशी का शुभ मुहूर्त

एकादशी तिथि प्रारंभ: 13 मार्च सुबह 10 बजकर 21 मिनट से।
एकादशी तिथि समाप्त:  14 मार्च 2022 को सुबह 2 बजकर 45 मिनट तक।
पारण का समय:  15 मार्च 2022को सुबह 6 बजकर 15 मिनट से सुबह 8  बजकर 20 मिनट तक।
 
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Amalaki ekadashi

 

महात्म्य

आमलकी यानी आंवला को शास्त्रों में उसी प्रकार श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है जैसा नदियों में गंगा को प्राप्त है और देवों में भगवान विष्णु को। विष्णु जी ने जब सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा को जन्म दिया उसी समय उन्होंने आंवले के वृक्ष को जन्म दिया। आंवले को भगवान विष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया है। इसके हर अंग में ईश्वर का स्थान माना गया है। भगवान विष्णु ने कहा है जो प्राणी स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं उनके लिए फाल्गुन शुक्ल पक्ष में जो पुष्य नक्षत्र में एकादशी आती है उस एकादशी का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है। इस एकादशी को आमलकी एकादशी के नाम से जाना जाता है।

आमलकी एकादशी व्रत विधि

स्नान करके भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष हाथ में तिल, कुश, मुद्रा और जल लेकर संकल्प करें कि मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता एवं मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रखता हूं। मेरा यह व्रत सफलता पूर्वक पूरा हो इसके लिए श्री हरि मुझे अपनी शरण में रखें। संकल्प के पश्चात षोड्षोपचार सहित भगवान की पूजा करें।
भगवान की पूजा के पश्चात पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष की पूजा करें। सबसे पहले वृक्ष के चारों की भूमि को साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें। पेड़ की जड़ में एक वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। इस कलश में देवताओं, तीर्थों एवं सागर को आमत्रित करें। कलश में सुगन्धी और पंच रत्न रखें। इसके ऊपर पंच पल्लव रखें फिर दीप जलाकर रखें। कलश के कण्ठ में श्रीखंड चंदन का लेप करें और वस्त्र पहनाएं। अंत में कलश के ऊपर श्री विष्णु के छठे अवतार परशुराम की स्वर्ण मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से परशुराम जी की पूजा करें। रात्रि में भगवत कथा व भजन कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें।
द्वादशी के दिन प्रात: ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा दें साथ ही परशुराम की मूर्ति सहित कलश ब्राह्मण को भेंट करें। इन क्रियाओं के पश्चात परायण करके अन्न जल ग्रहण करें।

आमलकी एकादशी व्रत कथा

अट्ठासी हजार ऋषियों को सम्बोधित करते हुए सूतजी ने कहा - "हे विप्रो! प्राचीन काल की बात है। महान राजा मान्धाता ने वशिष्ठजी से पूछा- 'हे वशिष्ठजी! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो ऐसे व्रत का विधान बताने की कृपा करें, जिससे मेरा कल्याण हो।'
महर्षि वशिष्ठजी ने कहा - 'हे राजन! सब व्रतों से उत्तम और अंत में मोक्ष देने वाला आमलकी एकादशी का व्रत है।'
राजा मान्धाता ने कहा- 'हे ऋषिश्रेष्ठ! इस आमलकी एकादशी के व्रत की उत्पत्ति कैसे हुई? इस व्रत के करने का क्या विधान है? हे वेदों के ज्ञाता! कृपा कर यह सब वृत्तांत मुझे विस्तारपूर्वक बताएं।'
महर्षि वशिष्ठ ने कहा- 'हे राजन! मैं तुम्हारे समक्ष विस्तार से इस व्रत का वृत्तांत कहता हूँ- यह व्रत फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में होता है। इस व्रत के फल के सभी पाप समूल नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत का पुण्य एक हजार गौदान के फल के बराबर है। आमलकी (आंवले) की महत्ता उसके गुणों के अतिरिक्त इस बात में भी है कि इसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के श्रीमुख से हुई है। अब मैं आपको एक पौराणिक कथा सुनाता हूँ। ध्यानपूर्वक श्रवण करो-
प्राचीन समय में वैदिक नामक एक नगर था। उस नगर में ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, शूद्र, चारों वर्ण के लोग प्रसन्ततापूर्वक रहते थे। नगर में सदैव वेदध्वनि गूंजा करती थी।
उस नगरी में कोई भी पापी, दुराचारी, नास्तिक आदि न था।
उस नगर में चैत्ररथ नामक चंद्रवंशी राजा राज्य करता था। वह उच्चकोटि का विद्वान तथा धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था, उसके राज्य में कोई भी गरीब नहीं था और न ही कंजूस। उस राज्य के सभी लोग विष्णु-भक्त थे। वहां के छोटे-बड़े सभी निवासी प्रत्येक एकादशी का उपवास करते थे।
एक बार फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की आमलकी नामक एकादशी आई। उस दिन राजा और प्रत्येक प्रजाजन, वृद्ध से बालक तक ने आनंदपूर्वक उस एकादशी को उपवास किया। राजा अपनी प्रजा के साथ मंदिर में आकर कलश स्थापित करके तथा धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न, छत्र आदि से धात्री का पूजन करने लगा। वे सब धात्री की इस प्रकार स्तुति करने लगे- 'हे धात्री! आप ब्रह्म स्वरूपा हैं। आप ब्रह्माजी द्वारा उत्पन्न हो और सभी पापों को नष्ट करने वाली हैं, आपको नमस्कार है। आप मेरा अर्घ्य स्वीकार करो। आप श्रीरामचंद्रजी के द्वारा सम्मानित हैं, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, मेरे सभी पापों का हरण करो।'
उस मंदिर में रात को सभी ने जागरण किया। रात के समय उस जगह एक बहेलिया आया। वह महापापी तथा दुराचारी था।
अपने कुटुंब का पालन वह जीव हिंसा करके करता था। वह भूख-प्यास से अत्यंत व्याकुल था, कुष्ठ भोजन पाने की इच्छा से वह मंदिर के एक कोने में बैठ गया।
उस जगह बैठकर वह भगवान विष्णु की कथा तथा एकादशी माहात्म्य सुनने लगा। इस प्रकार उस बहेलिए ने सारी रात अन्य लोगों के साथ जागरण कर व्यतीत की। प्रातःकाल सभी लोग अपने-अपने निवास पर चले गए। इसी प्रकार वह बहेलिया भी अपने घर चला गया और वहां जाकर भोजन किया।
कुछ समय बीतने के पश्चात उस बहेलिए की मृत्यु हो गई।
उसने जीव हिंसा की थी, इस कारण हालांकि वह घोर नरक का भागी था, परंतु उस दिन आमलकी एकादशी का व्रत तथा जागरण के प्रभाव से उसने राजा विदुरथ के यहां जन्म लिया। उसका नाम वसुरथ रखा गया। बड़ा होने पर वह चतुरंगिणी सेना सहित तथा धन-धान्य से युक्त होकर दस सहस्र ग्रामों का संचालन करने लगा।
वह तेज में सूर्य के समान, कांति में चंद्रमा के समान, वीरता में भगवान विष्णु के समान तथा क्षमा में पृथ्वी के समान था। वह अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर और विष्णु-भक्त था। वह प्रजा का समान भाव से पालन करता था। दान देना उसका नित्य का कर्म था।
एक बार राजा वसुरथ शिकार खेलने के लिए गया। दैवयोग से वन में वह रास्ता भटक गया और दिशा का ज्ञान न होने के कारण उसी वन में एक वृक्ष के नीचे सो गया। कुष्ठ समय पश्चात पहाड़ी डाकू वहां आए और राजा को अकेला देखकर 'मारो-मारो' चिल्लाते हुए राजा वसुरथ की ओर दौड़े। वह डाकू कहने लगे कि इस दुष्ट राजा ने हमारे माता-पिता, पुत्र-पौत्र आदि समस्त सम्बंधियों को मारा है तथा देश से निकाल दिया। अब हमें इसे मारकर अपने अपमान का बदला लेना चाहिए।
इतना कह वे डाकू राजा को मारने लगे और उस पर अस्त्र-शस्त्र का प्रहार करने लगे। उन डाकुओं के अस्त्र-शस्त्र राजा के शरीर पर लगते ही नष्ट हो जाते और राजा को पुष्पों के समान प्रतीत होते। कुछ देर बाद प्रभु इच्छा से उन डाकुओं के अस्त्र-शस्त्र उन्हीं पर प्रहार करने लगे, जिससे वे सभी मूर्च्छित हो गए।
उसी समय राजा के शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुई। वह देवी अत्यंत सुंदर थी तथा सुंदर वस्त्रों तथा आभूषणों से अलंकृत थी। उसकी भृकुटी टेढ़ी थी। उसकी आंखों से क्रोध की भीषण लपटें निकल रही थीं।
उस समय वह काल के समान प्रतीत हो रही थी। उसने देखते-ही-देखते उन सभी डाकुओं का समूल नाश कर दिया।
नींद से जागने पर राजा ने वहां अनेक डाकुओं को मृत देखा। वह सोचने लगा किसने इन्हें मारा? इस वन में कौन मेरा हितैषी रहता है?
राजा वसुरथ ऐसा विचार कर ही रहा था कि तभी आकाशवाणी हुई- 'हे राजन! इस संसार मे भगवान विष्णु के अतिरिक्त तेरी रक्षा कौन कर सकता है!'
इस आकाशवाणी को सुनकर राजा ने भगवान विष्णु को स्मरण कर उन्हें प्रणाम किया, फिर अपने नगर को वापस आ गया और सुखपूर्वक राज्य करने लगा।
महर्षि वशिष्ठ ने कहा- 'हे राजन! यह सब आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव था, जो मनुष्य एक भी आमलकी एकादशी का व्रत करता है, वह प्रत्येक कार्य में सफल होता है और अंत में वैकुंठ धाम को पाता है'।"

कथा-सार

भगवान श्रीहरि की शक्ति हमारे सभी कष्टों को हरती है। यह मनुष्य की ही नहीं, अपितु देवताओं की रक्षा में भी पूर्णतया समर्थ है। इसी शक्ति के बल से भगवान विष्णु ने मधु-कैटभ नाम के राक्षसों का संहार किया था। इसी शक्ति से उत्पन्ना एकादशी बनकर मुर नामक असुर का वध करके देवताओं के कष्ट को हरकर उन्हें सुखी किया था।


भगवान जगदीश्वर जी की आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ ॐ जय...॥
तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥
तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥
दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥
तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥
जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...॥


शनिवार, 20 मार्च 2021

वानस्पतिक तंत्र

वानस्पतिक तंत्र

नीबू के कुछ चमत्कारी प्रयोग इसका तंत्र में प्रयोग विभिन्न प्रकार के समस्याओं में इस नीबू का उपयोग जिसे आप खुद करके लाभ ले सकते हैं। सदियों से नीबू का प्रयोग कई कई तांत्रिक अभिकर्म टोने टोटको में होता आया है।
यह वानस्पतिक तंत्र के अंतर्गत भी आते हैं।
वानस्पतिक तंत्र
वानस्पतिक तंत्र




1) यदि आप या आपके परिवार में कोई हमेशा अस्वस्थ रहते हो बीमार रहते हों उनको दवा भी नही लग रही तब आप को किसी भी मंगलवार को एक नीबू लेना है।

उसी दिन सन्ध्या गोधूलि बेला के वक्त आप उस नीबू को लेकर पश्चिम दिशा की तरफ मुँह करके खड़े हो जाएं और आपको तीन बार बोलना है।

।ॐ ब्रम्ह ब्रम्ह मंडले नमो नमः।।

उसके बाद उस नीबू को अपने सर से या रोगी के सर से तीन बार घड़ी की सुई की उल्टी दिशा में तीन बार घुमाना है।  नीबू को सर पर से घुमाने के बाद वही उसे जमीन पर रखकर एक ही बार मे काट लेना है एक ही बार मे नीबू दो टुकड़े हो जाने चाहिए। फिर उस कटे नीबू के एक टुकड़े को अपने सामने की ओर और एक टुकड़े को अपने पीछे की ओर फेक देना है। ऐसा लगातार तीन मंगलवार तक करना है फिर इसका रिजल्ट परिणाम आप खुद देखेंगे।

2) जिनके जिन मां बाप के बच्चे उनका कहना न मान रहे हो मनमानी करते फिरते हो तब आप जब भी बच्चे को खाना देते हों।

आप अपने बच्चे को जब थाली में खाना खाने को परोसते हो उस वक्त उनके थाली के नीचे नीबू के पांच बीज रख दें
यह प्रयोग आप किसी भी गुरुवार को करें। और जब बच्चा खाना खा कर उठ जाए तब उस नीबू के बीज को वहां से उठा कर किसी केले के पेड़ नीचे दबा दें और दबा कर यह बोलना है। हे गुरुदेव आप मेरे बच्चे के अंदर अच्छे अच्छे गुण भर दें उसके अंदर सदाचार और सद्भावना विकसित करें। ऐसा आपको तीन गुरुवार लगातार करना है फिर आप देखेंगे इस प्रयोग का असर।।।।

3) यदि आपको कोई अनजाने भय सताते हो बुरे सपने यदि आपको अक्सर आते हो आपका मन अशांत रहता हो तब आप किसी पूर्णमासी के दिन रात दस बजे अपने बेडरूम में यह प्रयोग करें।

आप रात दस बजे एक हरा नीबू ले साथ ही पांच इलायची छोटी व पांच कपूर ले अब कपूर व इलायची को एक साफ सुथरी कटोरी में रसखकर जला ले। उसे जलाने के बाद नीबू अपने सर से पैर तक साथ बार उतारा करे फिर नीबू को काट कर उसी जली हुई कपूर इलायची में पूरा निचोड़ दें। और इन सब को ले जाकर किसी चौराहे पर फेंक आये इस प्रयोग को आपको सिर्फ एक ही बार करना है।

4) जिन मां बाप के बच्चों की पढ़ाई में मन न लगते हो एकाग्रता की उनमे बहुत कमी देखने को मिलते हो तो ऐसे में यह प्रयोग आपको करना है।

किसी भी सोमवार को आपको एक नीबू लेना है उस नीबू को काटकर एक कटोरी में निचोड़ लेना है फिर एक छोटा टुकड़ा कपड़े का उस नीबू के रस से भिगो लेना है। कपड़े भिगो लेने के बाद उसे धूप में सुखा लेना है उसे धूप में सुखा लेने के बाद थोड़ी सी सरसो के तेल में उसे डुबाकर डीप कर लेना है। और उसे बाती बना लेना बाती बनाकर उस बच्चे के सर पर से पांच बार घड़ी की सुई की उल्टी दिशा घुमाकर फिर उस बाती को घर पर ही किसी कोने में जला दें। उस बाती के जले हुए राख को रात को किसी चौराहे पर ही जाकर फेक आना फिर देखना इस प्रयोग का कैसा ।।मन जबरदस्त परिणाम आपको दिखने को मिलेगा।।

5) बहुत से लोगों का यह कहना होता है कि किसी ने हमपर कुछ करा रखा है हमपर जरूर किया कराया हुआ है हमपर जादू टोने मैली विद्या का प्रयोग किया गया है।

जिन पर तंत्र मंत्र की बाधा हो किये कराए हो जिन पर अमल काला जादू कर दिया गया हो वे लोग इस उपाय को करें। किसी भी मंगलवार के दिन ब्रम्हमुहूर्त में एक नीबू ले कर हनुमान जी के मंदिर में जाना है । मन्दिर में जाकर उस नीबू से हनुमान जी का सात बार उतारा करना नीबू फेरना है उनका उतारा करना है। उतारा करते वक्त हनुमान जी से अपनी समस्याएं मन ही मन बोल दे। फिर आप उस नीबू को ले कर पूरे मन्दिर की पांच परिक्रमा करें फिर  मन्दिर के पिछवाड़े खड़े हो अपने पर ऊपर से नीचे सात बार उतारा करें फिर नीबू को काटकर उस पर दो कपूर जला कर सीधे घर आ जाएं।

यह प्रयोग भी एक ही बार करें और आप इसका असर आप प्रत्यक्ष देख पाएंगे।



शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

Nath Panthiy Totke

 नाथ-पन्थीय टोटके


  1. चूहे का उपद्रव बन्द करना : ऊँट के बाएँ पैर का नाखून अनुराधा, पुष्य या उत्तरा नक्षत्र में लाकर घर में जलाएं। सभी चूहे भाग जाएंगे।
    Nath Panthiy Totke
    Nath Panthiy Totke

  2. खोए पशु हेतु : गाय, भैंस, बकरी आदि पशु खो जाय या रास्ता भूल कर घर तक न आए, तो जहाँ उसे बांधा जाता है, वहाँ की रस्सी में लोहे का चम्मच बाँध दे। इससे पशु कितनी भी दूर हो, अवश्य वापस आएगा। हाँ, कहीं किसी ने उसे बाँध कर न रखा हो।
  3. दांत का दर्द : करवन्दी (काली मैना, डोंगर मैना) की जड़ पानी में पीस कर उसका लेप दाँतों पर करे या दांतों से जड़ को चबाते हुए कुछ समय तक उसका रस दाँतों पर रहने दे। इससे दांतों का दर्द दूर होगा। दाँतों में सड़न हुई हो, तो भी यह उपाय लाभ-प्रद होगा।
  4.  सर्प को भगाना : अच्छी 'हींग' और 'वेखण्ड' पानी में पीस कर हाथ में लगा ले । इस हाथ से झटके के साथ सर्प की गर्दन पकड़े और उसे कहीं दूर छोड़ आए। उक्त लेप से सर्प - दंश नहीं करता।
  5.  सांप के काट लेने पर : कड़वे 'दोडके' के फल का काढ़ा बनाकर शुद्ध घी के साथ पिलाने से सर्प - दंश का विष उतर जाता है या उक्त फल के अन्दर की जाली पानी में पीस कर इस पानी को दंश-पीड़ित को पिलाए।
  6. सर्प-दंश से रक्षा : श्वेत गुजा की जड़ ग्रहण-काल में ले आए। धूप देकर ताबीज में बन्द कर धारण करे । सर्प-दंश का भय नहीं रहेगा।
  7.  मिरगी, चक्कर आदि का निवारण : काले धतूरे का रस ६ माशा तिली के ६माशे तेल में मिलाकर मिरगी, चक्कर आदि आने पर रोगी को पिलाए । आराम होगा।

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

नौकरी-प्राप्ति-मन्त्र

 नौकरी-प्राप्ति-मन्त्र 


कई लोग अपनी उच्च पढ़ाई करके भी नौकरी को लगने की बजाय घर पर ही बैठे रहते है. उनकी और से पूरी मेहनत करके भी हर टेस्ट में जैसे की नौकरी पाने के लिए परीक्षा ये होती है उनमे असफल होते है. ज्यादातर ऐसा होने के कई कारन होते है जैसे की आपके पढ़ाई में कमी या फिर अगर आपने दिलो जान से पढ़ा है फिर भी असफल हो रहे हो तो आपको किसी ग्रह का बुरा असर भी हो सकता है. या फिर आप भगवान् को दिलसे याद नहीं करते होंगे 



कई लोगो को नौकरी होने के बाद बहुत सालो से उनका प्रमोशन नही होता. उन्होंने कड़ी मेहनत करने के बावजूत भी उनका प्रमोशन नहीं होता इस सब के लिए आपके ग्रह उचित स्थान पर नहीं होंगे तो इसके लिए आपको आज हम नौकरी पाने का मंत्र आपको बताने जा रहे है .

प्रार्थना-


हे कामाक्षा ! हे शिव-शक्ति ! करते हैं हम भक्ति।

सुन लो भक्त की पुकार, बेड़ा है मझधार ॥ 

चलाकर पतवार, लगा दो मां! पार । 

तुम्हें शङ्कर की आन, सत-गुरु का कहना मान ॥

सहारा दे दो मां, हम हो रहे बेकार। निराशा का अन्धकार, दूर है किनार ॥

 दया - दृष्टि फेरो अम्ब ! बेड़ा करो पार । दोहाई है, दोहाई है, तुम्हारे चरणों में माई !

दोहाई कामरूप दानी की, दोहाई हाड़ी दासी की।

 

मन्त्र-

नमः कामाक्षा ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा ।।


विधि : 

शनिवार को शनि देव की पूजा कर उक्त प्रार्थना कर मन्त्र 108 बार जपे। इसके बाद गो-माता को गुड़ खिलाकर गाय के गोबर का उपला बनाए। उसे दिन भर सुखाए और रात को जलाए । जब तक वह उपला जलता रहे, तब तक उक्त मन्त्र पढ़ता रहे। उपला जब जल कर भस्म हो जाए, तब उसे उठाकर मिट्री के नए पात्र में रख दे। बाद में जब नौकरी, व्यापार या किसी कार्य के लिए यात्रा करनी हो, तो इस भस्म में से एक चुटकी लेकर, उसे उक्त मन्त्र से 7 बार अभिमन्त्रित कर, ललाट पर तिलक लगाए। इससे कार्य  में अवश्य सफलता प्राप्त होगी।


शनिवार, 8 अगस्त 2020

Havan Vidhi At Home

 हवन


हवन कुंड और हवन के नियमों के बारे में विशेष जानकारी


जन्म से मृत्युपर्यन्त सोलह संस्कार या कोई शुभ धर्म कृत्य यज्ञ अग्निहोत्र के बिना अधूरा माना जाता है। वैज्ञानिक तथ्यानुसार जहाॅ हवन होता है, उस स्थान के आस-पास रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणु शीघ्र नष्ट हो जाते है।

शास्त्रों में अग्नि देव को जगत के कल्याण का माध्यम माना गया है जो कि हमारे द्वारा दी गयी होम आहुतियों को देवी देवताओं तक पहुंचाते है। जिससे देवगण तृप्त होकर कर्ता की कार्यसिद्धि करते है। इसलिये पुराणों में कहा गया है।
अग्निर्वे देवानां दूतं  कोई भी मन्त्र जाप की पूर्णता , प्रत्येक संस्कार , पूजन अनुष्ठान आदि समस्त दैवीय कर्म , हवन के बिना अधूरा रहता है।
Havan Vidhi At Home
Havan Vidhi At Home



हवन दो प्रकार के होते हैं वैदिक तथा तांत्रिक. आप हवन वैदिक करायें या तांत्रिक दोनों प्रकार के हवनों को कराने के लिए हवन कुंड की वेदी और भूमि का निर्माण करना अनिवार्य होता हैं. शास्त्रों के अनुसार वेदी और कुंड हवन के द्वारा निमंत्रित देवी देवताओं की तथा कुंड की सज्जा की रक्षा करते हैं. इसलिए इसे “मंडल” भी कहा जाता हैं.

हवन की भूमि


हवन करने के लिए उत्तम भूमि को चुनना बहुत ही आवश्यक होता हैं. हवन के लिए सबसे उत्तम भूमि नदियों के किनारे की, मन्दिर की, संगम की, किसी उद्यान की या पर्वत के गुरु ग्रह और ईशान में बने हवन कुंड की मानी जाती हैं. हवन कुंड के लिए फटी हुई भूमि, केश युक्त भूमि तथा सांप की बाम्बी वाली भूमि को अशुभ माना जाता हैं.

हवन कुंड की बनावट


हवन कुंड में तीन सीढियाँ होती हैं. जिन्हें “ मेखला ” कहा जाता हैं. हवन कुंड की इन सीढियों का रंग अलग – अलग होता हैं.
  1.  हवन कुंड की सबसे पहली सीधी का रंग सफेद होता हैं
  2.  दूसरी सीढि का रंग लाल होता हैं
  3. अंतिम सीढि का रंग काला होता हैं
ऐसा माना जाता हैं कि हवन कुंड की इन तीनों सीढियों में तीन देवता निवास करते हैं.
  1.  हवन कुंड की पहली सीढि में विष्णु भगवान का वास होता हैं
  2.  दूसरी सीढि में ब्रह्मा जी का वास होता हैं
  3. तीसरी तथा अंतिम सीढि में शिवजी का वास होता हैं.
हवन कुंड के बाहर गिरी सामग्री को हवन कुंड में न डालें - आमतौर पर जब हवन किया जाता हैं तो हवन में हवन सामग्री या आहुति डालते समय कुछ सामग्री नीचे गिर जाती हैं. जिसे कुछ लोग हवन पूरा होने के बाद उठाकर हवन कुंड में डाल देते हैं. ऐसा करना वर्जित माना गया हैं. हवन कुंड की ऊपर की सीढि पर अगर हवन सामग्री गिर गई हैं तो उसे आप हवन कुंड में दुबारा डाल सकते हैं. इसके अलावा दोनों सीढियों पर गिरी हुई हवन सामग्री वरुण देवता का हिस्सा होती हैं. इसलिए इस सामग्री को उन्हें ही अर्पित कर देना चाहिए।

तांत्रिक हवन कुंड


 वैदिक हवन कुंड के अलावा तांत्रिक हवन कुंड में भी कुछ यंत्रों का प्रयोग किया जाता हैं. तांत्रिक हवन करने के लिए आमतौर पर त्रिकोण कुंड का प्रयोग किया जाता हैं.

हवन कुंड और हवन के नियम


हवन कुंड के प्रकार - हवन कुंड कई प्रकार के होते हैं. जैसे कुछ हवन कुंड वृताकार के होते हैं तो कुछ वर्गाकार अर्थात चौरस होते हैं. कुछ हवन कुंडों का आकार त्रिकोण तथा अष्टकोण भी होता हैं.

आहुति के अनुसार हवन कुंड बनवायें


 अगर अगर आपको हवन में 50 या 100 आहुति देनी हैं तो कनिष्ठा उंगली से कोहनी (1 फुट से 3 इंच )तक के माप का हवन कुंड तैयार करें.
  1.  यदि आपको 1000 आहुति का हवन करना हैं तो इसके लिए एक हाथ लम्बा (1 फुट 6 इंच ) हवन कुंड तैयार करें.
  2.  एक लक्ष आहुति का हवन करने के लिए चार हाथ (6 फुट) का हवनकुंड बनाएं.
  3.  दस लक्ष आहुति के लिए छ: हाथ लम्बा (9 फुट) हवन कुंड तैयार करें.
  4.  कोटि आहुति का हवन करने के लिए 8 हाथ का (12 फुट) या 16 हाथ का हवन कुंड तैयार करें.
  5. यदि आप हवन कुंड बनवाने में असमर्थ हैं तो आप सामान्य हवन करने के लिए चार अंगुल ऊँचा, एक अंगुल ऊँचा, या एक हाथ लम्बा – चौड़ा स्थण्डिल पीली मिटटी या रेती का प्रयोग कर बनवा सकते हैं.
  6. इसके अलावा आप हवन कुंड को बनाने के लिए बाजार में मिलने वाले ताम्बे के या पीतल के बने बनाए हवन कुंड का भी प्रयोग कर सकते हैं. 
  7. शास्त्र के अनुसार इन हवन कुंडों का प्रयोग आप हवन करने के लिए कर सकते हैं. पीतल या ताम्बे के ये हवन कुंड ऊपर से चौड़े मुख के और नीचे से छोटे मुख के होते हैं. इनका प्रयोग अनेक विद्वान् हवन – बलिवैश्व – देव आदि के लिए करते हैं.
  8. भविषयपुराण में 50 आहुति का हवन करने के लिए मुष्टिमात्र का निर्देश दिया गया हैं. भविष्यपूराण में बताये गए इस विषय के बारे में शारदातिलक तथा स्कन्दपुराण जैसे ग्रन्थों में कुछ मतभेद मिलता हैं।

हवन के नियम


 वैदिक या तांत्रिक दोनों प्रकार के मानव कल्याण से सम्बन्धित यज्ञों को करने के लिए हवन में “मृगी” मुद्रा का इस्तेमाल करना चाहिए.
1 हवन कुंड में सामग्री डालने के लिए हमेशा शास्त्रों की आज्ञा, गुरु की आज्ञा तथा आचार्यों की आज्ञा का पालन करना चाहिए.
2 हवन करते समय आपके मन में यह विश्वास होना चाहिए कि आपके करने से कुछ भी नहीं होगा. जो होगा वह गुरु के करने से होगा.
3 कुंड को बनाने के लिए अड़गभूत वात, कंठ, मेखला तथा नाभि को आहुति एवं कुंड के आकार के अनुसार निश्चित किया जाना च हिए.
4अगर इस कार्य में कुछ ज्यादा या कम हो जाते हैं तो इससे रोग शोक आदि विघ्न भी आ सकते हैं.
5 इसलिए हवन को तैयार करवाते समय केवल सुन्दरता का ही ध्यान न रखें बल्कि कुंड बनाने वाले से कुंड शास्त्रों के अनुसार तैयार करवाना चाहिए।

हवन करने के फायदे


1 हवन करने से हमारे शरीर के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं.
2 हवन करने से आस – पास का वातावरण शुद्ध हो जाता हैं.
3 हवन ताप नाशक भी होता हैं.
4 हवन करने से आस–पास के वातावरण में ऑक्सिजन की मात्रा बढ़ जाती हैं.

हवन से सम्बंधित कुछ आवश्यक बातें

अग्निवास का विचार

तिथि वार के अनुसार अग्नि का वास पृथ्वी ,आकाश व पाताल लोक में होता है। पृथ्वी का अग्नि वास समस्त सुख का प्रदाता है लेकिन आकाश का अग्नि वास शारीरिक कष्ट तथा पाताल का धन हानि कराता है। इसलिये नित्य हवन , संस्कार व अनुष्ठान को छोड़कर अन्य पूजन कार्य में हवन के लिये अग्निवास अवश्य देख लेना चाहिए।

हवन कार्य में विशेष सावधानियां

मुँह से फूंक मारकर, कपड़े या अन्य किसी वस्तु से धोक देकर हवन कुण्ड में अग्नि प्रज्ज्वलित करना तथा जलती हुई हवन की अग्नि को हिलाना - डुलाना या छेड़ना नही चाहिए।
हवन कुण्ड में प्रज्ज्वलित हो रही अग्नि शिखा वाला भाग ही अग्नि देव का मुख कहलाता है। इस भाग पर ही आहुति करने से सर्वकार्य की सिद्धि होती है। अन्यथा
कम जलने वाला भाग नेत्र - यहाँ आहुति डालने पर अंधापन ,
धुँआ वाला भाग नासिका - यहां आहुति डालने से मानसिक कष्ट ,
अंगारा वाला भाग मस्तक - यहां आहुति डालने पर धन नाश तथा काष्ठ वाला भाग अग्नि देव का कर्ण कहलाता है यहां आहुति करने से शरीर में कई प्रकार की व्याधि हो जाती है। हवन अग्नि को पानी डालकर बुझाना नही चाहिए।
विशेष कामना पूर्ति के लिये अलग अलग होम सामग्रियों का प्रयोग भी किया जाता है।

सामान्य हवन सामग्री ये है


  • तिल, 
  • जौं, 
  • चावल ,
  • सफेद चन्दन का चूरा , 
  • अगर ,
  •  तगर , 
  • गुग्गुल, 
  • जायफल, 
  • दालचीनी, 
  • तालीसपत्र , 
  • पानड़ी , 
  • लौंग , 
  • बड़ी इलायची , 
  • गोला , 
  • छुहारे , 
  • सर्वोषधि ,
  • नागर मौथा , 
  • इन्द्र जौ , 
  • कपूर काचरी , 
  • आँवला ,
  • गिलोय, 
  • ब्राह्मी तुलसी 
  • किशमिश, 
  • बालछड़ , 
  • घी आदि ..

हवन समिधाएँ


कुछ अन्य समिधाओं का भी वाशिष्ठी हवन पद्धति में वर्णन है । उसमें ग्रहों तथा देवताओं के हिसाब से भी कुछ समिधाएँ बताई गई हैं। तथा विभिन्न वृक्षों की समिधाओं के फल भी अलग-अलग कहे गये हैं।
यथा-

नोः पालाशीनस्तथा।
खादिरी भूमिपुत्रस्य त्वपामार्गी बुधस्य च॥
गुरौरश्वत्थजा प्रोक्त शक्रस्यौदुम्बरी मता ।
शमीनां तु शनेः प्रोक्त राहर्दूर्वामयी तथा॥
केतोर्दभमयी प्रोक्ताऽन्येषां पालाशवृक्षजा॥
आर्की नाशयते व्याधिं पालाशी सर्वकामदा।
खादिरी त्वर्थलाभायापामार्गी चेष्टादर्शिनी।
प्रजालाभाय चाश्वत्थी स्वर्गायौदुम्बरी भवेत।
शमी शमयते पापं दूर्वा दीर्घायुरेव च ।
कुशाः सर्वार्थकामानां परमं रक्षणं विदुः ।
यथा बाण हारणां कवचं वारकं भवेत ।
तद्वद्दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारिका॥
यथा समुत्थितं यन्त्रं यन्त्रेण प्रतिहन्यते ।
तथा समुत्थितं घोरं शीघ्रं शान्त्या प्रशाम्यति॥

अब समित (समिधा) का विचार कहते हैं, सूर्य की समिधा मदार की, चन्द्रमा की पलाश की, मङ्गल की खैर की, बुध की चिड़चिडा की, बृहस्पति की पीपल की, शुक्र की गूलर की, शनि की शमी की, राहु दूर्वा की, और केतु की कुशा की समिधा कही गई है । इनके अतिरिक्त देवताओं के लिए पलाश वृक्ष की समिधा जाननी चाहिए । मदार की समिक्षा रोग को नाश करती है, पलाश की सब कार्य सिद्ध करने वाली, पीपल की प्रजा (सन्तति) काम कराने वाली, गूलर की स्वर्ग देने वाली, शमी की पाप नाश करने वाली, दूर्वा की दीर्घायु देने वाली और कुशा की समिधा सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाली होती है। जिस प्रकार बाण के प्रहारों को रोकने वाला कवच होता है, उसी प्रकार दैवोपघातों को रोकने वाली शान्ति होती है। जिस प्रकार उठे हुए अस्त्र को अस्त्र से काटा जाता है, उसी प्रकार (नवग्रह) शान्ति से घोर संकट शान्त हो जाते हैं।

ऋतुओं के अनुसार समिधा के लिए इन वृक्षों की लकड़ी विशेष उपयोगी सिद्ध होती है।
वसन्त-शमी
ग्रीष्म-पीपल
वर्षा-ढाक, बिल्व
शरद-पाकर या आम
हेमन्त-खैर
शिशिर-गूलर, बड़
यह लकड़ियाँ सड़ी घुनी, गन्दे स्थानों पर पड़ी हुई, कीडे़-मकोड़ों से भरी हुई न हों, इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए।

विभिन्न हवन सामग्रियाँ और समिधाएं विभिन्न प्रकार के लाभ देती हैं। विभिन्न रोगों से लड़ने की क्षमता देती हैं।
प्राचीन काल में रोगी को स्वस्थ करने हेतु भी विभिन्न हवन होते थे। जिसे वैद्य या चिकित्सक रोगी और रोग की प्रकृति के अनुसार करते थे पर कालांतर में ये यज्ञ या हवन मात्र धर्म से जुड़ कर ही रह गए और इनके अन्य उद्देश्य लोगों द्वारा भुला दिए गये।
सर भारी या दर्द होने पर किस प्रकार हवन से इलाज होता था इस श्लोक से देखिये :-
श्वेता ज्योतिष्मती चैव हरितलं मनःशिला।। गन्धाश्चा गुरुपत्राद्या धूमं मुर्धविरेचनम्।।
(चरक सू* 5/26-27)
अर्थात अपराजिता , मालकांगनी , हरताल, मैनसिल, अगर तथा तेज़पात्र औषधियों को हवन करने से शिरो विरेचन होता है।
परन्तु अब ये चिकित्सा पद्धति विलुप्त प्राय हो गयी है।

रोग और उनके नाश के लिए प्रयुक्त होने वाली हवन सामग्री

  •  सर के रोग, सर दर्द, अवसाद, उत्तेजना, उन्माद मिर्गी आदि के लिए ब्राह्मी, शंखपुष्पी , जटामांसी, अगर , शहद , कपूर , पीली सरसो
  • स्त्री रोगों, वात पित्त, लम्बे समय से आ रहे बुखार हेतु बेल, श्योनक, अदरख, जायफल, निर्गुण्डी, कटेरी, गिलोय इलायची, शर्करा, घी, शहद, सेमल, शीशम
  • पुरुषों को पुष्ट बलिष्ठ करने और पुरुष रोगों हेतु सफेद चन्दन का चूरा , अगर , तगर , अश्वगंधा , पलाश , कपूर , मखाने, गुग्गुल, जायफल, दालचीनी, तालीसपत्र , लौंग , बड़ी इलायची , गोला
  •  पेट एवं लिवर रोग हेतु भृंगराज, आमला , बेल , हरड़, अपामार्ग, गूलर, दूर्वा , गुग्गुल घी , इलायची
  •  श्वास रोगों हेतु वन तुलसी, गिलोय, हरड , खैर अपामार्ग, काली मिर्च, अगर तगर, कपूर, दालचीनी, शहद, घी, अश्वगंधा, आक, यूकेलिप्टिस।

हवन में आहुति डालने के बाद क्या करें

आहुति डालने के बाद तीन प्रकार के क्षेत्रों का विभाजित करने के बाद मध्य भाग में पूर्व आदि दिशाओं की कल्पना करें. इसके बाद आठों दिशाओं की कल्पना करें. आठों दिशाओं के नाम हैं – पूर्व अग्नि, दक्षिण, नीऋति, पश्चिम, वायव्य, उत्तर तथा इशान।

हवन की पूर्णाहुति में ब्राह्मण भोजन


""ब्रह्स्पतिसंहिता "" के अनुसार यज्ञ हवन की पूर्णाहुति वस्तु विशेष से कराने पर निम्न संख्या में ब्राह्मण भोजन अवश्य कराना चाहिए।
  • पान - 5 ब्राह्मण
  • पक्वान्न - 10 ब्राह्मण
  • ऋतुफल - 20 ब्राह्मण
  • सुपारी - 21 ब्राह्मण
  • नारियल - 100 ब्राह्मण
  • घृतधारा - 200 ब्राह्मण
हवन यज्ञ आदि से सम्बंधित समस्त जानकारियो के लिये ""यज्ञ मीमांसा "" देखें।

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

घर से नेगेटिविटी दूर करने की धूनी

घर से नेगेटिविटी दूर करने की धूनी


ये बहुत ही फायदेमंद धूनी है इसका लाभ होगा इतना मिलेगा आप गिनती नही कर पाओगे ।
आपको अगर लगता है घर में कोई अदृश्य शक्ति है , सुबह शाम घर में बिना वजह घर में लड़ाई झगड़े होना , व्यापार में अकारण गिरावट आ जाना, आदि बहुत सी मुसीबतों का हल ये धूनी है । इस धूनी को बनानी की सामग्री है 

घर से नेगेटिविटी दूर करने की धूनी
घर से नेगेटिविटी दूर करने की धूनी


1.लोहबान
2.सफेद चंदन
3.गाय का शुद्ध देशी घी
4.शुद्ध गूगल
5.हवन सामाग्री का पैकेट
6.काले तिल

ये सभी सामग्री पूजा पाठ का जहा सामान मिलता है उस पर आसानी से मिल जाएंगी ।आप इनको आवश्यकतानुसार मिक्स करले । फिर गाय के गोबर का उपला (कंडा) जलाये जब उपले की आग बन जाये तब उसके ऊपर थोड़ी वो मिक्स की गयी सामग्री रखे फिर इसको पुरे घर में घुमाये और फिर इसे कही घर में साफ जगह पर ही रखदे ऐसा आप हर रोज करे । ऐसा करने से आपको बहुत लाभ होगा ।

रविवार, 26 जुलाई 2020

Madar Ka Vriksh | AAk ka Ped

मदार (वानस्पतिक नाम:Calotropis gigantea) एक औषधीय पादप है। इसको मंदार', आक, 'अर्क' और अकौआ भी कहते हैं। इसका वृक्ष छोटा और छत्तादार होता है। पत्ते बरगद के पत्तों समान मोटे होते हैं। हरे सफेदी लिये पत्ते पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं। इसका फूल सफेद छोटा छत्तादार होता है। फूल पर रंगीन चित्तियाँ होती हैं। फल आम के तुल्य होते हैं जिनमें रूई होती है। आक की शाखाओं में दूध निकलता है। वह दूध विष का काम देता है। आक गर्मी के दिनों में रेतिली भूमि पर होता है। चौमासे में पानी बरसने पर सूख जाता है।

Madar Ka Vriksh | AAk ka Ped

Madar Ka Vriksh | AAk ka Ped 


मदार का वृक्ष


आक के पौधे शुष्क, उसर और ऊँची भूमि में प्रायः सर्वत्र देखने को मिलते हैं। इस वनस्पति के विषय में साधारण समाज में यह भ्रान्ति फैली हुई है कि आक का पौधा विषैला होता है, यह मनुष्य को मार डालता है। इसमें किंचित सत्य जरूर है क्योंकि आयुर्वेद संहिताओं में भी इसकी गणना उपविषों में की गई है। इसे वनस्पतिकपारद भी कहा जाताहै। यदि इसका सेवन अधिक मात्रा में कर लिया जाये तो, उल्दी दस्त होकर मनुष्य की मृत्यु हो सकती है। इसके विपरीत यदि आक का सेवन उचित मात्रा में, योग्य तरीके से, चतुर वैद्य की निगरानी में किया जाये तो अनेक रोगों में इससे बड़ा उपकार होता है।

तंत्र श्रेत्र में श्वेतार्क प्रजाति के मदार की बहुत उपयोगिता बताई गयी है। तीन चार वर्ष से अधिक पुराने वृक्ष की कुछ जड़ें लगभग पूर्ण रूप से परिपक्व हो जाती है । उसके बाद सावधानी पूर्वक सम्भव हो तो शुभ मुहूर्त में इसको विधिनुसार से निकाला जाता है।उसके बाद इसे दो दिन शुद्ध पानी एवं गंगा जल में रखा जाता है।उसके बाद कारीगर से इस जड़ की माला बनवाई जाती है। 

साधारणतरह से ये माला आप को किसी भी  अत्यंत दुर्लभ है।इसको नियमित धारण करने से त्रिसुखों की प्राप्ति होती है। माला धारण करने से पहले लाल वस्त्र धारण करके लाल आसन, लाल पुष्प, लाल चंदन, से पूजन तथा नैवेद्य में गुड़ तथा खोपरे को अर्पण करके निम्न मंत्र का 108 बार जप करें। उसके बाद माला धारण करे इससे भगवान गणेश की कृपा साधक को अवश्य ही मिलती है।
 मंत्र निम्नलिखीत है।

।।'ऊँ वक्रतुण्डाय हूं ।। 


इसके बाद इसे धारण करने से ऊपरी करा- कराया तंत्र मंत्र भूत प्रेत की बाधा कला जादू का असर भी तुरंत समाप्त हो जाती है। कहते है की इसे धारण करने से स्वयं काल भी पीछा छोड़ देते है। अकालमृत्यु का भय दूर होता है।
कुछ सरल से उपाय सिद्धश्वेतार्कजड़ की माला के यह प्रस्तुत है।

  1. सिद्ध सफेदआक की जड़ की माला रविपुष्य नक्षत्र में लाई गई,चंदन का टुकड़ा,7 लक्ष्मीकोड़ी,लाल कपड़े में लपेटकर घर के तिजोरी में या दुकान के कैशबॉक्स मे रख लें,घरएवं दूकान में सुख-शांति तथा समृद्धि बनी रहेगी।
  2. गणेश मंदिर या अपने पूजा घर मे बैठकर प्रतिदिन 'ऊँ गं गणपतये नमः' की एक माला सिध्द स्वेतर्क के जड़ की माला से जप करें, हर क्षेत्र में लाभ एवं धन की प्राप्ति होती है आपकि पुरानी लेनदारिया वापस आने लगती है।
  3. सिद्धश्वेतार्कके जड़ की माला पूजाघर में स्थापित करें। नित्य एक दूर्वाघास अर्पण कर श्रद्धापूर्वक गणपति जी का ध्यान किया करें, प्रत्येक कार्य में सफलता मिलेगी तथा सब प्रकार के विघ्नों से आपकी रक्षा होगी।
  4. श्वेतार्क के पत्ते पर अपने शत्रु का नाम इसके ही दूध से लिखकर जमीन में दबा दे, वह शांत रहेगा। इस पत्ते को जल में प्रवाहित कर दें तो शत्रु आपको छोड़कर और कहीं चला जाएगा। इस पत्ते से यदि होम करते हैं तब तो शत्रु का भगवान ही मालिक है ।
  5. श्वेतार्क के फल से निकलने वाली रुई की बत्ती तिल के तेल के दीपक में जलाकर लक्ष्मी साधनाएँ करें, माता लक्ष्मीजी की आप पर कृपा बनी रहेगी ।
  6. सिद्धश्वेतार्क के जड़ की माला, मूंगा, फिटकरी, लहसुन तथा मोर का पंख एक थैली में सिल लें। यह एक नजरबट्टू बन जाएगा। बच्चे के सोते समय चौंकना, डरना, रोना आदि में यह बहुत लाभदायक सिद्ध होगा।
  7. सिद्धसफेद आक की जड़ कीमाला से गणेश चतुर्थी से अनन्त चतुर्दशी तक नित्य 'ऊँ गं गणपतये नम' मंत्र से पूजा करें, सुख, समृद्धि और धन की प्राप्ति होगी तथा मनोवांछित कामनाएं पूर्ण होंगी।
  8. सिद्ध श्वेतार्ककी जड़ की माला से 108 बार 'ऊँ नमो विघ्नहराय गं गणपतये नमः' मंत्र जप करते हुए दूधमिश्रित जल से भगवान गणेश को अर्ध्य देने से , दुष्ट ग्रह शांत होते है एवं मंगलदोष , एवं पित्रदोष समाप्त होजाता है।
  9. सिद्धश्वेतार्क की जड़ की माला से 108 बार 'ऊँ नमो अग्नि रूपाय ह्रीं नमः' मंत्र जपकर गले मे धारण करने से यात्रा में दुर्घटना का भय समाप्त होजाता है।
  10. सिद्धश्वेतार्क की माला से सोमवार के दिन ऊँ जूं सः रुं रुद्राय नमः सः जूँ ऊँ' मंत्र जपते हुए हवन सामग्री से होम किया जय तो रोगो का नाश होने लगेगा घर मे अगर कोई बीमार है तो रोग जाता रहेगा एवं वस्तु के कारण आ रही परेशानियां दूर होंगी
  11. पूर्णिमा की रात्रि सिद्ध सफेद आक की जड़ की माला से 'ऊँ नमः श्वेतगात्रे सर्वलोकं वशंकरि दुष्टानां वशं कुरू कुरू (अमुकं) में वशमानाय स्वाहा' मंत्र का जप करें। अमुक के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम जप करें जिसको वश में करना है तुरंत वशिकरण होता है। 

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रविवार, 7 जून 2020

karja mukti ka upay

!! कर्जा मुक्ति का प्रायोगिक उपाय !!



किसी व्यक्ति पर अपने सगे संबंधी बैंक आदि का कर्जा चढ़ा हुआ है तथा कई प्रयासों के बाद भी कर्जा नहीं उतर रहा हो, व्यापार में हानि हो रही हो, आर्थिक उन्नति में बाधा आ रही हो तो, उनके लिये घण्टाकर्ण महावीर के मंत्र जाप का उपाय करना होगा! यह प्रयोग किसी भी पूर्णिमा को कर सकते है! इसके लिये साधक को शुद्ध आसन जो उनी हो उस पर सफेद स्वच्छ वस्त्र धारण करके, उत्तर दिशा की ओर मुंह करके, दीपक एक घी का जलाकर तथा एक तेल का अपने पूजन स्थान में धरें

karja mukti ka upay
karja mukti ka upay

 (पूजन स्थान नहीं हो तो घर की ईशानकोण ) काले हकीक की माला पर नित्य बिना नागा 20 दिन काले हकीक की माला 108 मनके की पर पाँच माला मंत्र जप करना है! माला जपे तब (सात गोमती चक्र ) किसी पात्र में साफ जल से धोकर, केशर का तीलक उन गोमतीचक्रों पर लगाकर अपने सामने धरें, फिर मंत्र जप करें तथा मंत्र जप माला ढ़ककर जपें, जपोपरांत अपने आसन के नीचे जल छोङकर जरा सा फिर वो अपने मस्तक पर लगायें, व एक रोटी पहली जो बनती है उस रोटी में एक आलू काटकर कटे स्थान पर हल्दी छिङकर गाय को दें, तथा अंतिम रोटी तेल से चूपङ कर कुत्ते को दें!

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व्यापार को कैसे स्थिर किया जा सकता है?


--मंत्र --

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं क्रों घण्टाकर्ण महावीर लक्ष्मी पूरय पूरय सुख सौभाग्य कुरु-कुरु स्वाहा


■जब मंत्र पूर्ण हो जाये 20 दिन तब माला को जल में प्रवाहित कर दें तथा गोमतीचक्रों को अपने तिजोरी, गल्ले या जहाँ धन गहना आदि हो उनके साथ रख दें! इससे जीवन में व्यापार वृद्धि, आर्थिक उन्नति उत्तरोत्तर रहेगी जिससे कर्जा नहीं रहेगा! पूर्णतया प्रायोगिक है आप भी करें, अन्य जो ऐसी समस्या से परेशान है उन्हें भी बतायें पुण्य कमाये !!

शनिवार, 6 जून 2020

lal kitab kismat chamkane ke upay

दुर्भाग्य दूर करने के लिये अचूक उपाय


राई से दरिद्रता निवारण:-

पैसों का कोइ जुगाड़ न बन रहा हो तथा घर में दरिद्रता का वाश हो तो यह करें: एक पानी भरे घड़े में राई के पत्ते डालकर इस जल को अभिमंत्रित करके जिस भी किसी व्यक्ति को स्नान कराया जाएगा उसकी दरिद्रता रोग नष्ट हो जाते हैं।

तोते का उपाय:-

किसी भी मंगल की शाम एक नर एक मादा तोता लेकर आये और उसे एक रात घर मे रखने के बाद बुधवार की शाम उन्हें हाथ मे लेकर कहे कि जैसे हम तुम्हे आजाद कर रहे है उस तरह आप हमे भी बन्धनो से आजाद करे फ़िर दोनो तोते को अपने हाथो से आजाद कर दे।

lal kitab kismat chamkane ke upay
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ताले का उपाय:-

यदि आपको धन की परेशानी है, नौकरी मे दिक्कत आ रही है, प्रमोशन नहीं हो रहा है या आप अच्छे करियर की तलाश में है तो यह उपाय कीजिए : किसी दुकान में जाकर किसी भी शुक्रवार को कोई भी एक स्टील का ताला खरीद लीजिए ! लेकिन ताला खरीदते वक्त न तो उस ताले को आप खुद खोलें और न ही दुकानदार को खोलने दें ताले को जांचने के लिए भी न खोलें ! उसी तरह से डिब्बी में बन्द का बन्द ताला दुकान से खरीद लें ! इस ताले को आप शुक्रवार की रात अपने सोने के कमरे में रख दें ! शनिवार सुबह उठकर नहा-धो कर ताले को बिना खोले किसी मन्दिर, गुरुद्वारे या किसी भी धार्मिक स्थान पर रख दें ! जब भी कोई उस ताले को खोलेगा आपको अवश्य ही कुछ ना कुछ लाभ होगा।

घर के मंदिर में चांदी के बर्तन नहीं रखने चाहिए यह पितरो के प्रतीक है घर के मंदिर में देवता और पितृ कि पूजा एक साथ नहीं कि जा सकती ना ही दोनों कि फोटो रखी जा सकती है घर के मंदिर में सिर्फ देवी देवता कि मूर्ति या तस्वीर रखी जा सकती है।

दुर्भाग्य निवारण के लिए:-

कभी-कभी न चाहते हुए भी जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है। भाग्य बिल्कुल भी साथ नहीं देता साथ ही दुर्भाग्य निरन्तर पीछा करता रहता है। दुर्भाग्य से बचने के लिए या दुर्भाग्य नाश के लिए यहां हम आपको एक अनुभूत टोटका बता रहे हैं। इसे पूर्ण आस्था के साथ करने से दुर्भाग्य का नाश होकर सौभाग्य में वृद्धि होती है। हमारी या हमारे परिवार के किसी भी सदस्य की ग्रह स्थिति थोड़ी सी भी अनुकूल होगी तो हमें निश्चय ही इन उपायों से भरपूर लाभ मिलेगा।
व्यापार, विवाह या किसी भी कार्य के करने में बार-बार असफलता मिल रही हो तो यह टोटका करें- सरसों के तैल में सिके गेहूँ के आटे व पुराने गुड़ से तैयार सात पूये, सात मदार (आक) के पुष्प, सिंदूर, आटे से तैयार सरसों के तैल का रूई की बत्ती से जलता दीपक, पत्तल या अरण्डी के पत्ते पर रखकर शनिवार की रात्रि में किसी चौराहे पर रखें और मन मे संकल्प करें -“हे मेरे दुर्भाग्य तुझे यहीं छोड़े जा रहा हूँ कृपा करके मेरा पीछा ना करना।´´ सामान रखकर पीछे मुड़कर न देखें।

अथवा


  • 1 आटे 1 नीबू का दिया,
  • 7 लाल मिर्च, 7 लड्डू,
  • 2 बत्ती,
  • 2 लोंग,
  • 2 बड़ी इलायची,
  • 1 बाद अथवा केले का पत्ता।


इन सभी वस्तुओ को लेकर मध्यरात्रि के समय जब घर से निकले तब यह प्रार्थना करें "हे दुर्भाग्य, संकट, विपत्ती आप मेरे साथ चलें और बीच चौराहे पर बङ या केले के पत्ते पर ये सारी चीजें रख दें फिर प्रार्थना करें मैं विदा हो रहा हूँ आप मेरे साथ न आयें, चारों रास्ते खुले हैं आप कहीं भी जायें ये उपाय महीने में दो से तीन बार करके देखें, उपाय लाभकारी है लेकिन श्रद्धा से करें।
 प्रतिदिन हनुमान जी का पूजन करे व हनुमान चालीसा का पाठ करें ! प्रत्येक शनिवार को शनि को तेल चढायें !

 अपनी पहनी हुई चप्पल की जोड़ी किसी गरीब को शनिवार के दिन दान करें यह प्रक्रिया कम से कम 3 बार दोहराये।

 सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त से पहले इस टोटके को करना है। एक रोटी लें। इस रोटी को अपने ऊपर से 31 बार ऊवार लें। प्रत्येक बार वारते समय इस मन्त्र का उच्चारण भी करें।

ऊँ दुभाग्यनाशिनी दुं दुर्गाय नम:

बाद में यह रोटी कुत्ते को खिला दें अथवा बहते पानी में बहा दें।

शत्रु पक्ष से परेशानी:-


यदि आपको शत्रु पक्ष से परेशानी हैं तो कर्पूर के काजल से शत्रु का नाम लिखकर अपने पैर से मिटा दें।

शनि दृष्टि दोष दूर करने के लिये:-


उड़द की दाल के 4 बड़े शनिवार को प्रात: सिर से 3 बार एंटी क्लाकवाइज (उलटा) घुमाकर कौओं को खिलाएं। (सात शनिवार करो)।

नोट:- उपाय एव टोटको को करने से पहले इनके प्रति पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिये एवं उपाय और टोटके पूर्वसंचित प्रारब्ध को नही काटते है भाग्य में जितना लिखा है व्यक्ति को उतना ही मिलता है परन्तु किसी की लगी बद्दुआ अथवा नजर दोष या अन्य प्रकार की क्रिया दोष के कारण भाग्योदय का समय आने पर भी लाभ से वंचित रहने पर संबंधित दोषों को काटने में अवश्य मददगार साबित होते है। हमसे जुड़ें रहने के लिए हमारे ग्रुप से जुड़े।

गुरुवार, 19 मार्च 2020

Pitru Dosh

Pitra Dosh-पितृ दोष


भारतीय हिन्‍दुधर्म की मान्‍यतानुसार पितृ दोष एक ऐसी स्थिति का नाम है, जिसके अन्‍तर्गत किसी एक के किए गए पापों का नुकसान किसी दूसरे को भोगना पडता है।

उदाहरण के लिए पिता के पापों का परिणाम यदि पुत्र को भोगना पडे, तो इसे पितृ दोष ही कहा जाएगा क्‍योंकि हिन्‍दु धर्म की मान्‍यता यही है कि पिता के किए गए अच्‍छे या बुरे कामों का प्रभाव पुत्र पर भी पडता है। इसलिए यदि पिता ने अपने जीवन में अच्‍छे कर्म की तुलना में बुरे कर्म अधिक किए हों, तो मृत्‍यु के बाद उनकी सद्गति नहीं होती और ऐसे में वे प्रेत योनि में प्रवेश कर अपने ही कुल को कष्ट देना शुरू कर देते हैं। इसी स्थिति को पितृ दोष के नाम से जाना जाता है।


Pitra Dosh-पितृ दोष
Pitra Dosh-पितृ दोष


इसके अलावा ऐसा भी माना जाता है कि किसी भी व्‍यक्ति के पूर्वज पितृलोक में निवास करते हैं और पितृ पक्ष के दौरान ये पूर्वज पृथ्‍वी पर आते हैं तथा अपने वंशजों से भोजन की आशा रखते हैं। इसलिए जो लोग पितृपक्ष में अपने पूर्वजों या पितरों जैसे कि पिता, ताया, चाचा, ससुर, माता, ताई, चाची और सास आदि का श्राद्ध, तर्पण, पिण्‍डदान आदि नहीं करते, उनके पितर अपने वंशजों से नाराज हाेकर श्राप देते हुए पितृलोक को लौटते हैं, जिससे इन लोगों को तरह-तरह की परेशानियों जैसे कि आकस्मिक दुर्घटनाओं, मानसिक बीमारियों, प्रेत-बाधा आदि से सम्‍बंधित अज्ञात दु:खों को भोगना पडता है और जिन्‍हें पितृ दोष जनित माना जाता है।

साथ ही ऐसी भी मान्‍यता है कि जो लोग अपने पूर्वजन्‍म में अथवा वर्तमान जन्‍म में अपने से बडों का आदर नहीं करते बल्कि उनका अपमान करते हैं, उन्‍हें पीडा पहुंचाते हैं, अपने, पूर्वजों का शास्त्रानुसार श्राद्ध व तर्पण नहीं करते, पशु-पक्षियों की व्यर्थ ही हत्या करते हैं और विशेष रूप से रेंगने वाले जीवों जैसे कि सर्प आदि का वध करते हैं, ऐसे लोगों को पितृ दोष का भाजन बनना पडता है।

पितृ दोष के संदर्भ में यदि हम धार्मिक मान्‍यताओं के अनुसार बात करें तो जब हमारे पूर्वजों की मृत्‍यु होती है और वे सदगति प्राप्‍त न करके अपने निकृष्‍ट कर्मो की वजह से अनेक प्रकार की कष्टकारक योनियों में अतृप्ति, अशांति व असंतुष्टि का अनुभव करते हैं, तो वे अपने वंशजों से आशा करते हैं कि वे उनकी सद्गति या मोक्ष का कोई साधन या उपाय करें जिससे उनका अगला जन्म हो सके अथवा उनकी सद्गति या मोक्ष हो सके।

उनकी भटकती हुई आत्मा को यदि सद्गति देने के लिए उनके वंशज कोई प्रयास करते हैं, तो वे आत्‍माऐं उन्‍हें आर्शीवाद देती हैं, जिससे उन लोगों की जिन्‍दगी धार्मिक, आर्थिक, व्‍यावसायिक, सामाजिक व मानसिक आदि सभी स्‍तरों पर काफी अच्‍छी हो जाती है। लेकिन यदि सद्गति देने के लिए उनके वंशज कोई प्रयास न करें, तो पूर्वजाें की आत्‍माऐं यानी पितर असंतुष्ट रहते हैं और अपने वंशजों को दु:खी करते हैं, जिसका लक्षण वंशजों की जन्‍म-कुण्‍डली में पितृ दोष के रूप में परिलक्षित होता है।

हिन्‍दु धर्म में पितृदोष से कई प्रकार की हानियों का विस्‍तृत वर्णन है जिनके अन्‍तर्गत यदि कोई व्‍यक्ति पित्रृदोष से पीडित हो, तो उसे अनेक प्रकार की मानसिक परेशानियां व हानियां उठानी पडती है, जिनमें से कुछ निम्‍नानुसार हैं-

राक्षस, भूत-प्रेत, पिशाच, डाकिनी-शाकिनी, ब्रहमराक्षस आदि विभिन्न प्रकार की अज्ञात परेशानियों से पीडित होना पडता है।

  • ऐसे लोगों के घर में हमेंशा कलह व अशांति बनी रहती है।
  • रोग-पीडाएं इनका पीछा ही नहीं छोडती।
  • घर में आपसी मतभेद बने रहते है। आपस में लोगों के विचार नहीं मिल पाते जिसके कारण घर में झगडे होते रहते है।
  • कार्यों में अनेक प्रकार की बाधाएं उत्पन्न हो जाती है।
  • अकाल मृत्यु का भय बना रहता है।
  • संकट, अनहोनीयां, अमंगल की आशंका बनी रहती है।
  • संतान की प्राप्ति में विलंब होता है अथवा संतान होती ही नहीं है।
  • घर में धन का अभाव रहता है।
  • आय की अपेक्षा खर्च अधिक होता है अथवा अच्छी आय होने पर भी घर में बरकत नहीं होती जिसके कारण धन एकत्रित नहीं हो पाता।
  • संतान के विवाह में काफी परेशानीयां और विलंब होता है।
  • शुभ तथा मांगलीक कार्यों में काफी दिक्कते उठानी पडती है।
  • अथक परिश्रम के बाद भी थोडा-बहुत फल मिलता है।
  • बने-बनाए काम को बिगडते देर नहीं लगती।
  • तो यदि बहुत मेहनत करने के बाद भी वांछित सफलता प्राप्‍त न हो, हमेंशा किसी न किसी तरह की परेशानी लगी ही रहे, घर के किसी न किसी सदस्‍य को मानसिक परेशानी या मानसिक रोग लगा ही रहे, जिसका ईलाज अच्‍छे से अच्‍छा चिकित्‍सक भी ठीक से न कर पाए, घर के निवासियों के बार-बार बेवजह अकल्‍पनीय रूप से एक्सीडेंट्स होते हों, तो इस प्रकार की अप्राकृतिक स्थितियों का कारण पितृ दोष हो सकता है।


पितृ दोष है या नहीं – कैसे जानें ?

हिन्‍दु धर्म में ज्‍योतिष को वेदों का छठा अंग माना गया है और किसी व्‍यक्ति की जन्‍म-कुण्‍डली देखकर आसानी से इस बात का पता लगाया जा सकता है कि वह व्‍यक्ति पितृ दोष से पीडित है या नहीं। क्‍योंकि यदि व्‍यक्ति के पितर असंतुष्‍ट होते हैं, तो वे अपने वंशजों की जन्‍म-कुण्‍डली में पितृ दोष से सम्‍बंधित ग्रह-स्थितियों का सृजन करते हैं।

भारतीय ज्‍योतिष-शास्‍त्र के अनुसार जन्म-पत्री में यदि सूर्य-शनि या सूर्य-राहु का दृष्टि या युति सम्‍बंध हो, जन्म-कुंडली के प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम व दशम भावों में से हो, तो इस प्रकार की जन्‍म-कुण्‍डली वाले जातक को पितृ दोष होता है। साथ ही कुंडली के जिस भाव में ये योग होता है, उसके सम्‍बंधित अशुभ फल ही प्राथमिकता के साथ घटित होते हैं।

उदारहण के लिए 

यदि सूर्य-राहु अथवा सूर्य-शनि का अशुभ योग-प्रथम भाव में हो, तो वह व्यक्ति अशांत, गुप्त चिंता, दाम्पत्य एवं स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ होती हैं क्‍योंकि प्रथम भाव को ज्योतिष में लग्न कहते है और यह शरीर का प्रतिनिधित्व करता है।

दूसरे भाव में हो, तो धन व परिवार से संबंधित परेशानियाँ जैसे कि पारिवारिक कलह, वैमनस्य व आर्थिक उलझनें होती हैं।
चतुर्थ भाव में हो तो भूमि, मकान, सम्‍पत्ति, वाहन, माता एवं गृह सुख में कमी या कष्ट होते हैं।
पंचम भाव में हो तो उच्च विद्या में विघ्न व संतान सुख में कमी होने के संकेत होते हैं।
सप्तम भाव में हो तो यह योग वैवाहिक सुख व साझेदारी के व्‍यवसाय में कमी या परेशानी का कारण बनता है।
नवम भाव में हो, तो यह निश्चित रूप से पितृदोष होता है और भाग्‍य की हानि करता है।
दशम भाव में हो तो सर्विस या कार्य, सरकार व व्यवसाय संबंधी परेशानियाँ होती हैं।
उपरोक्‍तानुसार किसी भी प्रकार की ग्रह-स्थिति होने पर अचानक वाहनादि के कारण दुर्घटना का भय, प्रेत बाधा, ज्वर, नेत्र रोग, तरक्की में रुकावट या बनते कार्यों में विघ्न, अपयश, धन हानि व मानसिक रोगों से सम्‍बंधित अनिष्ट फल प्राप्‍त होते हैं।

पित्र दोष निवारण – सरल उपाय

पीपल और बरगद के वृ्क्ष की पूजा करने से पितृ दोष की शान्ति होती है।
पितृपक्ष मे अपने पितरों की याद मे पीपल या बरगद का वृक्ष लगाकर, उसकी पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने से भी पितृदोष समाप्त होता है ।

प्रत्येक अमावस्या को कंडे की धूनी लगाकर उसमें खीर का भोग लगाकर दक्षिण दिशा में पितरों का आव्हान करने व उनसे अपने कर्मों के लिये क्षमायाचना करने से भी पितृ दोष की शान्ति होती है।

सूर्योदय के समय किसी आसन पर खड़े होकर सूर्य को निहारने, जल चढाने, उससे शक्ति देने की प्रार्थना करने और गायत्री मंत्र का जाप करने से भी सूर्य मजबूत होता है जिसकी कमजोरी ही पितृ दोष का मुख्‍य कारण है।
सोमवती अमावस्या के दिन पितृ दोष निवारण पूजा करने से भी पितृ दोष में लाभ मिलाता है।

घर के सभी बड़े-बुजुर्गों को प्रेम, सम्मान और पूर्ण अधिकार दिया जाना चाहिए। धार्मिक मान्‍यता है कि ऐसा करने से पित्र दोष में लाभ मिलता है।

अमावस्या को बबूल के पेड़ पर संध्या के समय भोजन रखने से भी पित्तर प्रसन्न होते है।
आप चाहे किसी भी धर्म को मानते हो घर में भोजन बनने पर सर्वप्रथम पित्तरों के नाम की खाने की थाली निकालकर गाय को खिलाने से उस घर पर पित्तरों का सदैव आशीर्वाद रहता है। घर के मुखियां को भी चाहिए कि वह भी अपनी थाली से पहला ग्रास पित्तरों को नमन करते हुए कौओं के लिये अलग निकालकर उसे खिला दें।

श्री मद भागवत गीता का ग्यारहवां अध्याय का पाठ करें।
शनिवार के दिन पीपल की जड़ में गंगा जल, काला तिल चढाऐं।
जब भी किसी तीर्थ पर जाएं तो अपने पितरों के लिए तीन बार अंजलि में जल से उनका तर्पण अवश्य ही करें ।

पितृदोष निवारण के लिए अपने घर की दक्षिण दिशा की दीवार पर अपने दिवंगत पूर्वजों के फोटो लगाकर उन पर हार चढ़ाकर सम्मानित करना चाहिए तथा उनकी मृत्यु तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र एवं दक्षिणा सहित दान, पितृ तर्पण एवं श्राद्ध कर्म करने चाहिए।

भोजन से पहले तेल लगी दो रोटी गाय को खिलाएं।
श्राद्धपक्ष या वार्षिक श्राद्ध में ब्राह्मणों के लिए तैयार भोजन में पितरों की पसंद का पकवान जरुर बनाएं।
देवता और पितरों की पूजा स्थान पर जल से भरा कलश रखकर सुबह तुलसी या हरे पेड़ों में चढ़ाएं।

हालांकि कुण्‍डली में दिखाई देने वाला कोई भी दोष उस जातक के लिए कभी भी पूरी तरह से समाप्‍त नहीं हो सकता। लेकिन यदि किसी की कुण्‍डली में पितृ दोष हो, तो वह इन उपायों में से जितने सम्‍भव हो सके, उन्‍हें उपयोग में लेकर अपने पितृ दोष के प्रभावों में कमी ला सकता है।

यधपि मान्‍यता ये है कि यदि कोई पितृ दोष या कालसर्प दोष से पीडित हो और उसने कभी भी पितृ दोष या कालसर्प दोष निवारण से सम्‍बंधित कभी कोई उपाय नहीं किया है, तो उसकी जन्‍म-कुण्‍डली में पितृ दोष या कालसर्प दोष के योग जरूर होंगे। साथ ही उसकी संतानों की कुण्‍डली में भी पितृ दोष या कालसर्प दोष से सम्‍बंधित योग दिखाई देंगे और एसा इसलिए होता है क्‍योंकि पितृ दोष व कालसर्प दोष कई पीढियों में आगे से आगे समान रूप से चलता रहता है।

इसलिए यदि आपकी कुण्‍डली में पितृ दोष या कालसर्प दोष है, तो उसका यथा सम्‍भव निवारण कीजिए। जब आप पितृ दोष या कालसर्प दोष से सम्‍बंधित सभी उपयुक्‍त उपाय करते हैं और यदि आपका पितृ दोष या कालसर्प दोष का प्रभाव कम या समाप्‍त होता है, तो उस स्थिति में आपके परिवार में जन्‍म लेने वाली अगली संतान की जन्‍म-कुण्‍डली में पितृ दोष या कालसर्प दोष से सम्‍बंधित योग पूरी तरह से समाप्‍त हो जाते हैं। जबकि यदि जन्‍म लेने वाली नई संतान की कुण्‍डली में भी पितृ दोष या कालसर्प दोष के योग दिखाई दें, तो ये इसी बात का संकेत है कि अभी भी आपका पितृ दोष या कालसर्प दोष पूरी तरह से समाप्‍त नहीं हुआ है।

यहां एक बाद ध्‍यान रखने वाली ये है कि हालांकि कालसर्प दोष का सम्‍बंध श्राद्ध से है, लेकिन पितृ दोष का कोई सम्‍बंध कालसर्प दोष से नहीं है। कालसर्प दोष और पितृ दोष, दोनों को अक्‍सर मिला दिया जाता है क्‍योंकि दोनों ही प्रकार के दोषों का निवारण करने के लिए श्राद्ध करना होता है। जबकि वास्‍तव में श्राद्ध भी 5 प्रकार के होते हैं, और पितृ पक्ष में किया जाने वाला पितृ यज्ञ या पितृ श्राद्ध, उनमें से एक है तथा कालसर्प योग के दोष या सर्प दोष के निवारण के लिए जो श्राद्ध किया जाता है, उसे नारायणबलि, नागबलि या त्रिपिण्‍डी श्राद्ध के नाम से जाना जाता है और इसका कोई सीधा सम्‍बंध पितृ दोष से नहीं होता।

पितृ दोष निवारण कैसे करें ?

पूर्वजों के कारण, विशिष्ट प्रकार के आध्यात्मिक कष्ट होते हैं । इसलिए ऐसे कष्टों का निवारण (पितृ दोष निवारण) भी विशिष्ट आध्यात्मिक उपायों से ही होता है । ऐसे कष्टों में, शारीरिक एवं मानसिक उपायों से केवल लक्षण में ही सुधार हो सकता है; परंतु कष्ट के मूल का निवारण  नहीं हो पाता । 

उदा. यदि किसी को चर्म रोग पितृदोष के कारण हुआ हो, तो चिकित्सकीय उपचार से उसे राहत तो मिलेगी; परंतु वह रोग पूर्ण रूपसे ठीक नहीं होगा तथा उसके पुनः होने की संभावना बनी रहेगी । दत्तात्रेय एक देवता हैं, जिनका तारक नामजप ‘श्री गुरुदेव दत्त’ पितृ दोष निवारण (पितरों की अतृप्ति के कारण होने वाले कष्टों से निवारण)  हेतु सहायक है । हमारा परामर्श है कि इसे प्रतिदिन अपने पंथानुसार उपयुक्त / इष्टदेवता / कुलदेवता के नामजप के साथ करना चाहिए ।

भगवान दत्तात्रेय का नामजप विशिष्ट रूप से पितरों के आध्यात्मिक कष्टों से निवारण (पितृ दोष निवारण) का विदित उपाय है ।  दूसरी ओर, अपने जन्मानुसार पंथ के इष्टदेवता के नामजप से हमें आध्यात्मिक प्रगति के लिए पोषक, सर्वसामान्य आवश्यक आध्यात्मिक तत्त्व मिलते हैं । परंतु भगवान दत्तात्रेय के नामजप से आध्यात्मिक प्रगति नहीं होती; अपितु सुरक्षा-कवच मिलता है । ओर पितृ दोष निवारण होता है ।

पितृ दोष निवारण, इसे एक तुलनात्मक उदाहरण से समझते हैं । किसी को यदि सर्दी हुई हो, तो उसे विटामिन सी की अतिरिक्त मात्रा लेनी पडती है । यहां विटामिन सी, भगवान दत्तात्रेय का जप है । विटामिन सी के साथ हम अच्छे स्वास्थ्य के लिए हम मल्टी विटामिन्स (अर्थात अपने जन्मानुसार पंथ के इष्टदेवता का नामजप) लेते हैं

जब हम पितृ दोष निवारण हेतु ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का नामजप करते हैं; तब भगवान दत्तात्रेय का चैतन्य हमारी ओर आकर्षित होता है, इससे निम्नलिखित लाभ होते हैं :-

हमारी स्थूल एवं सूक्ष्मदेह के चारों ओर सुरक्षा-कवच निर्मित होता है, जिससे हमारे पितरों द्वारा निर्माण की गई  बाधाओं से हम बच जाते हैं । ओर पितृ दोष निवारण होता है ।
हमारे पितरों का हमारे साथ जो लेन-देन है, वह चुकाने में सहायता होती है, जिससे उनका हम पर होने वाला  दुष्प्रभाव घट जाता है ।
हमारे पितरों की आगे की यात्रा सुगम होने में सहायता होती है।
तथापि जप का लाभ, हमारे आध्यात्मिक स्तर तथा जप की संख्यात्मक एवं गुणात्मक मात्रा पर निर्भर करता है ।

पितृ दोष निवारण हेतु हम ‘श्री गुरुदेव दत्त’ का सुरक्षा-कवच जप कष्ट की तीव्रता के अनुरूप प्रतिदिन जपने का परामर्श देते हैं, क्योंकि यह हमारे जीवन में आध्यात्मिक बाधाओं को मूल रूप से दूर करने में विदित जप है । उत्तम होगा कि हम यह जप प्रतिदिन प्रात:काल में करें, जिससे पूरे दिन आध्यात्मिक रूप से हमारा  रक्षण होगा । इसके उपरांत पूरा दिन हम अपने जन्मानुसार, पंथ के इष्टदेवता का जप कर सकते हैं ।

पितरों के कष्टों की तीव्रता के अनुरूप, पितृ दोष निवारण के लिए हम ‘ श्री गुरुदेव दत्त’ के नामजप की मात्रा का सुझाव देते हैं । यह आध्यात्मिक शोध एवं ज्ञान पर आधारित है, जो हमें विश्वमन तथा विश्वबुद्धि से अतिजाग्रत छठवीं इंद्रिय के माध्यम से मिलता है ।

पितृ दोष शान्ति प्रयोगः

काल सर्प दोष वाले व्यक्ति तथा गुरुराहु, शनि राहु, मंगल राहु, युतिवाले एवं गुरु, सूर्य दूषित होवे उनके भी पितर दोष होता है। पितृ सूक्त "अथर्व वेदोक्त' काण्ड 28 में बहुत से सूक्त है। इनमें से कुछ श्लोकों को चयनित करके 3 तरह के सूक्त दिये है। 1. अधोगति हेतु सूक्त 2. हवि प्रदान करते समय अग्नि से प्रार्थना 3. पितरो से शान्ति प्रार्थना "मार्कण्डेय पुराण' में भी रुचिमनु कृत स्तोत्र, सप्तार्चिस्तव एवं पितृस्तोत्र के ६२ श्लोक दिये है उनका पठन करने भी शुभ फल एवं शांति प्राप्त होवे।

(॥ पितृ सूक्तम्॥१॥

अधोगति प्रेत हेतु इदं त एकं पर ऊ त एक तृतीयेन् ज्येतिषा सं विशस्व। संवेशने तन्वा चारुरेधिं प्रियो देवानां परमे सधस्थे॥१॥उत्तिष्ठ प्रेहि प्र द्रबौकः कृणुष्व सलिले सधस्थे। तत्र त्व पितृभिः संविदानः सं सोमेन मदस्व सं स्वधाभिः॥ २॥ प्रच्यवस्त्र तन्वं सं भरस्व मा ते गात्रा वि हायि मो शरीरम्। मनो निविष्टमनुसंविशत्व यत्र भूमेर्जुषसे तत्र गच्छ ॥ ३॥ वर्चसा मां पितरः सोम्यासो अञ्जन्तु देवा मधुना घूतेन। चक्षु से मा प्रतरं तारयन्तो जरसे मा जरदष्टिं वर्धन्तु ॥४॥शते नीहारो भवतु शते पुष्वाव शीयताम्।शीतिके शीतिकावति लादिकेलादिकावति। मण्डूक्यप्सु श भुव इस स्वग्निं शमय ॥५॥ त्रीणि पदानि रुपो अन्वराहच्चतुष्पदीमन्वैद व्रतेन।अक्षरेण प्रति मितिते अर्कमृतस्य नाभावसि स पुनाति॥ ६॥ एतदा रोह बय उन्मजानः स्वा इह वृहदु दीदयन्ते। अभि प्रेहि मध्यतो माप बुहास्थाःपितॄणां लोकं प्रथमो यो अत्र ॥७॥ शुम्भन्तां लोकाः पितृषदनाः पितृषदने त्वा लोक आ सादयामि॥८॥ जलांजलि निम्न ऋचा से देवे।। शतधारं वायुयर्क स्वर्विद नृचक्षसस्ते अभि चक्षते रयिम्। ये पृणन्ति प्र च यच्छन्ति सर्वदा ते दुहृते दक्षिणों सप्तमातरम् ॥९॥ कोशं दुहन्ति कलशं चतुर्बिलमिडां धेनुं मधुमती स्वस्तये। ऊर्ज महन्तीमदितिं जनेष्वग्ने मा हिसी: परमे व्योमत् ॥१०॥

॥पित सूक्तम् ॥२॥

(हवि पिण्ड प्रदान करते समय) 

अग्निप्वात्ताः पितर एह गच्छत सदः सदः सदत सुप्रणीतयः।अत्तो हवींषि प्रयतानि बहिषि रयि च नः सर्ववीर दधात॥१॥आ यात पितरः साम्यासा गम्भीरैः पथिभिः पितृयाणैः। आयुरस्मभ्य दधतः प्रजां च रायश्च पोषैरभि नः सचध्यम् ॥ २॥ अक्षन्नमीमदन्त शव प्रियां अधूषतः। अस्तोषत स्वभानवो विप्रा यविष्ठा ईमहे ॥३॥ अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नमः ॥ ४॥ सोमाय पितृमते स्वधा नमः ॥५॥ पितृभ्यः तोमवद्भय स्वधा नमः ॥६॥यमाय पितृमते स्वधा नमः ॥७॥ एतत् ते प्रततामह स्वधा ये च त्वामनु ॥८॥ एतत् ते ततामह स्वधा ये च त्वामनु ॥१॥ एतत् ते त्रत स्वधा॥१०॥ स्वधा पितृभ्यः पृथिविषद्भयः ॥११॥ स्वधा पितृभ्यो अन्तरिक्षसद्भयः ॥ १२॥ स्वधा पितृभ्यो दिविषदभ्यः ॥१३॥ परा यात पितरः साभ्यासा गम्भीरै पथिभिः पूर्याणैः अधा मासि पुनरा यात नो गृहान् हविरत्तं सुप्रजसः सुवीरा ॥१४॥

॥पित सूक्तम्॥३॥ 

(ऋग्वेदोक्तम्) यमो नो गातुं प्रथमो विवेद नैषा गव्यूतिरपभर्तवा उ। यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुरेना जज्ञानाः पथ्या अनु स्वाः॥१॥ अङ्गिरसो न पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः। तेषाँ वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम॥२॥ प्रेहि प्रेहि पथिभिः पूय॑भिर्यत्रा नः पूर्वे पितरः परेयुः। उभा राजाना स्वधया मदन्ता यमं पश्यासि वरुणं च देवम् ॥३॥आयान्तु नः पितरः सोम्यासोग्निस्वाताः पथिमिर्देवयानैः। अस्मिन्त यज्ञे स्वधया मदन्तेधि बुवनतु तेवन्त्वस्मान्॥ ४॥ ऊर्जं वहन्तीतरमृङ् धृतम्पयः कीलालम्परित्रुतम्। स्वधास्त्थ तर्पयत में पितॄन ॥५॥संगच्छस्व पितृभिः सं यमेनेष्टापूर्तेन परमे व्योमन्। हित्वायावद्यं पुनरस्तमेहि सं गच्छस्व तन्वा

सुवर्चाः ॥६॥ यमाय मधुमत्तमं राज्ञे हव्यं जुहोतन। इदं नम ऋषिभ्यः पूर्वेजेभ्यः पूर्वेभ्यः पथिकृभ्यः ॥७॥ उंदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोभ्यासः। असंय ईयरवका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु॥ ८॥ इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः। ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु ॥९॥आहं पितॄन् त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः। बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः ॥१०॥ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः। आग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाङ् सत्यैः कव्यैः पितृभिर्धर्मसभ्दिः॥११॥येह चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्म याँ उ च न प्रविम । त्वं वेत्थ यति ते जातवेददः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व ॥१२॥ ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते। तेभिः स्वरालसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयस्व ॥१३॥

॥ पितृ सूक्तम् ॥४॥

(शांति प्रार्थना) आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे माय। पुत्रैभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्रयच्छत त इहोर्ज दधात्॥१॥ये सत्यासो हविरदौ हविष्या इन्द्रेण देवैः सरथं तरेण।आग्ने याहि सुविदत्रेभिरवपिरैः पूर्वऋषिभिर्घर्मसद्भिः ॥२॥ परा यात पितर आ च याताय वो यज्ञो मधुना समवतः। दत्तो अस्मभ्यं द्रविणेहि भद्रं रयिं च नः सववीर दधात॥३॥कण्वः कक्षीवान् पुरुमीढा अगस्त्य श्यावाश्वः सोभयचनानाः। विश्वामित्रोऽयं जमदग्नित्रिरवन्त नः कश्यपो वामदेवः ॥४॥ विश्वामित्र जमदग्ने वसिष्ठ भरद्वाज गौतम वामदेवः । शर्दि! अत्रिरग्राभीन्नोमोभिः सुशसास: पितरो मृडता नः ॥५॥ ये नः पितुः पितरो ये पितामहा य अविविशुरुर्वन्तरिक्षम्। तेभ्यः स्वराडसनीति। अद्य यथावशं तन्वः कल्पयाति॥६॥ नमो वः पितर ऊर्जें नमो व पितरो रसाय ॥७॥ नमो वः पितयो भीमाय नमो वः पितरो मन्यवे॥८॥ नमो वः पितरो यद्धारं तस्मै नमो वः पितरो यत क्रूरं तस्मै॥९॥ नमो वः पितरो यच्छिव तस्मै नमो वः पितरो यत् स्योनं तस्मै॥ १०॥ नमो वः पितरः स्वधा वः पितरः ॥११॥ येऽत्र पितरः पितरो येऽत्र यूयं स्थ युष्मांस्तेऽनु पूयं तेषां श्रेष्ठा भूयास्थ॥१२॥ य इह पितरो जीवा वयं स्मः। अस्मांस्तेऽनु वय तेषां श्रेष्ठा भूयास्म ॥१३॥

॥ इति पितृ शान्तिः प्रयोग॥


शनिवार, 7 मार्च 2020

Totke For Business Growth In Hindi

Totke For Business Growth In Hindi


व्यापार को कैसे स्थिर किया जा सकता है?


व्यवसाय व्यवसायियों के लिए जीवन है क्योंकि यह व्यवसाय व्यक्ति के लिए कमाई का स्रोत है। सभी व्यवसायी हमेशा अपने व्यवसाय को स्थिर बनाने की इच्छा रखते हैं ताकि वे अपने व्यक्तिगत जीवन और परिवार में सुधार कर सकें।

Totke For Business Growth In Hindi
Totke For Business Growth In Hindi


तो आइए जानें कि व्यापार को कैसे स्थिर किया जा सकता है?


  • यह 21 दिनों का अनुष्ठान है इसलिए आपको रोजाना 125 ग्राम सरसों के तेल की आवश्यकता होती है। यह अनुष्ठान शनिवार से शुरू होगा और फिर अगले 21 दिनों तक जारी रखने की आवश्यकता है।
  • इसलिए शनिवार को  1.25 फिट गहरे गड्ढे खोदें।
  • अब शाम के समय सबसे पहले इस गड्ढे के किनारे पर सरसों के तेल का मिट्टी का दीपक जलाएं और वहां 5 मिठाई चढ़ाएं और फिर इस गड्ढे के चारों ओर एक मग ताजा पानी डालें और फिर इस 125 ग्राम तेल को 21 बार घुमाएं (ध्यान दें कि इसे 21 बार हिलना चाहिए केवल और न ही अधिक) न तो आप दक्षिणावर्त से सिर से पैर तक, फिर इस गड्ढे में तेल डालें।
  • अब गड्ढे को घास या झाड़ी (झाड़ी) से ढक दें, इसलिए अगले दिन ठीक उसी समय पर आएं और पहले दिन की तरह ही प्रक्रिया का पालन करें।


यह आपके व्यवसाय को स्थिर बनाने और आपके व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए बहुत तेज़ और तत्काल उपाय है। निश्चित रूप से यह उपाय आपके व्यवसाय की उच्च और मूल्यवान ऊंचाइयों में भी सुधार करेगा। आपका व्यवसाय इन 21 दिनों के भीतर चलने और अच्छा लाभ मोड में होगा। तो यह आसान, सरल और शक्तिशाली तरीका है कि आप अपने व्यवसाय को कैसे स्थिर बना सकते हैं।

व्यवसाय या दुकान को हानि से बचाने का उपाय 


लाभ या हानि किसी भी व्यवसाय या दुकान का मुख्य कारक है। हर दुकानदार हमेशा लाभ के लिए प्रयास करता है और कभी किसी नुकसान की इच्छा नहीं करता है लेकिन किसी भी ढीले बिंदु के कारण दुकानदार को कई बार अवांछित नुकसान का सामना करना पड़ता है। तो इस तरह के नुकसान से बचने के लिए या इन नुकसानों से दुकान को रोकने के लिए, हम यहां दिए गए उपाय या अनुष्ठान कर सकते हैं।

हम दुकान पर नुकसान को कैसे रोक सकते हैं ताकि दुकानदार हर सत्र में केवल लाभ कमा सके?


  •  सबसे पहले 7 ब्रेड या रोटियां पकाना शुरू करें, अब उस पर सरसों का तेल लगाएं और इसे काले कुत्ते या कुत्तों को अर्पित करें।
  • अब कुत्तों को बिना किसी अन्य रंग के पूरी तरह से काला होना चाहिए।
  • अब शनिवार को काले तिल 125 ग्राम का चढ़ाएं। इस तिल को काले कपड़े की चादर में बांधकर पीपल के पेड़ के नीचे गड्ढा खोदकर वहां डाल दें।
  • अब उस पर सरसों का तेल डालें और फिर से अगले सात शनिवार के लिए फिर से तेल की रोटी काले कुत्ते की रस्म से शुरू करें।
  • जब दुकान लाभ देने लगे तो काले तिल के काले कपड़े को पीपल के पेड़ की जड़ से निकाल लें और उन्हें गुड़ में मिलाकर काले कुत्तों को खाने के लिए दें।



यह उपाय बहुत शक्तिशाली है और कभी भी विफल नहीं होता है। इसे केवल सकारात्मक परिणाम दिखाना होगा। तो ऐसे उपाय का उपयोग करके हम नुकसान को रोक सकते हैं और दुकान से अच्छा लाभ कमा सकते हैं।

माल  बेचा लेकिन भुगतान प्राप्त नहीं हुआ का उपाय 

व्यवसाय स्वस्थ है दोनों पक्ष एक-दूसरे का सहयोग करते हैं और उचित अनुमान के साथ समय पर माल और भुगतान भेजते हैं। व्यावसायिक स्वास्थ्य हमेशा अच्छे प्रबंधन, व्यावसायिक दलों और उनके व्यवहार के बीच अच्छे संबंध पर निर्भर करता है। यदि उनमें से कोई एक जिम्मेदारी के साथ व्यवहार नहीं करता है, तो निश्चित रूप से व्यवसाय नहीं बढ़ सकता है। इसलिए व्यवहार जिम्मेदार और ईमानदारी से होना चाहिए।

माल भेजते समय व्यापार भागीदार को क्या करना चाहिए लेकिन व्यवसाय भुगतान प्राप्त नहीं हुआ?


  • सबसे पहले उस साथी से कोई कपड़ा या लकड़ी मंगवाएं जो भुगतान नहीं दे रहा है और उसका पता भी ले लें। नोट केवल उस लेख का उपयोग करें जो उसने / उसने केवल अपने हाथों से दिया था।
  • अब 1.25 फीट की लंबाई वाले सभी लेखों के साथ एक नाव बनाएं।
  •  सात जायफल (जायफल) की व्यवस्था करें और उन व्यक्तियों का नाम लिखें, जिन्होंने भुगतान से इनकार किया है।
  • उस नाव में काला झंडा लगाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाएं। इस हल्के दीपक में सभी जायफल डालें लेकिन एक जायफल को तेल में गीला करने और कुत्ते की जीभ को छूने और फिर नाव के पीछे रखने की जरूरत है।
  • इस अनुष्ठान को केवल शनिवार को करने की आवश्यकता है।



यह अनुष्ठान उपाय दृष्टिकोण को बदल देगा और यह व्यवसाय भागीदार आपके भुगतान को स्वयं बनाने के लिए आएगा। इस मामले के लिए वास्तव में शक्तिशाली और प्रभावी आध्यात्मिक उपाय है जब माल भेजा गया लेकिन भुगतान प्राप्त नहीं हुआ।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

Dharan Ka ilaj in Hindi

Dharan Ka ilaj in Hindi Mantra


नाभि का उपचार :


 सेहतमंद रहने के लिए शरीर के केंन्द्र बिंदू नाभि का उसकी सही जगहें पर होना बहुत जरूरी है। कई बार नाभि अपनी जगहें से खिसक जाती है, जिसे धरण पड़ना या नाभि खिसकना भी कहते है। इससे पेट में दर्द, गैस, भूख न लगना, टांगों में कंपकपाहट, घबराहट आदि समस्याएं हो सकती है। आज हम आपको नाभि खिसकने के कुछ कारण, लक्षण और उपाय बताएंगे, जिससे आप इस परेशानी से छुटकारा पा सकते है।
Dharan Ka ilaj in Hindi
Dharan Ka ilaj in Hindi

नाभि खिसकने के कारण

1. गलत लाइफस्टाइल, भूख न लगना, एक्सरसाइज न करना और पूरी नींद न लेने के कारण धरण पड़ने की समस्या हो सकती है।
2. कोई भारी काम करते समय या खेल-कूद के कारण भी नाभि खिसक सकती है।
3. अचानक एक पैर पर भार पड़ने, सीढ़िया उतरते समय और दाएं बाय झुकने से भी धरण पड़ जाती है।
4. एक बार यह समस्या होने पर इसके बाद यह बार-बार हो सकती है।

नाभि खिसकने के लक्षण


1. पेट में धरण पड़ने से तेज दर्द और दस्त की समस्या हो जाती है।
2. रोगी को पीठ के बल लेटाकर उसकी नाभि को दबाएं। अगर नाभि के नीचे धड़कन महसूस न हो तो वो अपनी जगह पर नहीं है।
3. नाभि खिसकने पर रोगी को अपच और कब्ज की समस्या हो जाती है।

नाभि का खिसकना के उपाय शाबर मंत्र द्वारा 

धरण  ठिकाने लाने का मंत्र -

ओम् नमो नाड़ी नाड़ी नौ सौ बहत सो कोठा चले 
अगाडी डिगे न कोठा चलेन नाड़ी। 
रक्षा करे हनुमतको आन । 
मेरी भक्ति गुरु की शक्ति:
फरी - मंत्र ईश्वरो वाचा।। 

विधि :- 
किसी सूत में नौ बार मंत्र पढ़कर नौ गांठ लगाएं। तथा उसे छल्ले के समान गोल बनाकर नाभी पर रख दें। -फिर नौ बार मंत्र पढ़ते हुए उस पर फूक मारें। धरण  ठिकाने पर आ जाएगी। 

नाभि का खिसकना के उपाय


 सौंफ 10 ग्राम सौंफ को पीसकर उसमें 50 ग्राम गुड़ मिलाकर सुबह खाली पेट खाएं। 2-3 दिन इसका सेवन करने से नाभि अपनी जगहें पर आ जाएगी।

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