शाबर मंत्र, तंत्र यंत्र साधना, गुरु गोरखनाथ परंपरा के प्राचीन सिद्ध मंत्र, वशीकरण, सुरक्षा मंत्र, बाधा निवारण मंत्र और शक्तिशाली लोकपरंपरा आधारित साधनाओं का संपूर्ण ज्ञान। यहाँ आप सरल मंत्र विधि, प्रयोग, तांत्रिक माध्यम और आध्यात्मिक जानकारी आसानी से सीख सकते हैं।

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मंगलवार, 2 अगस्त 2022

hinglaj devi ka shabar mantra

  हिङ्गलाज देवी का शाबर मन्त्र 

आज हम आपको मां हिगलाज माता के बारे में एक बहुत ही प्रभावशाली व शक्तिशाली मां हिगलाज के शाबर मंत्र के बारे में बताने जा रहे है यह मां हिगलाज माता का दुर्लब शाबर मंत्रों में से एक शाबर मंत्र है जिसका प्रयोग कर माता हिगंलाज का आशीर्वाद प्राप्त कर पायेगे। जो आपके जीवन में आपने वाले अनकों कष्टों को दूर कर पायेगे।

 

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ॐ निरङ्कार भवानी । 

इन्दर की बेटी, ब्रह्मा की साली। 

दोनों हाथ बजावे ताली, जा बैठी पीपल की डाली।

 इन्द्र मोहूँ, ब्रह्मा मोहूं, मोहूँ सारी दुनिया। 

दुहाई हनुमान जी, दुहाई हिङ्गलाज, दुहाई गरुण नारायण की । 

वीर धनञ्जय, दुहाई लोना चमाइच की।



विधि : 

 121 बार उक्त मन्त्र का जप करे। जप के बाद सात बार हवन करे । हवन-सामग्री-गाय का दूध, तुलसी-पत्ती, बेल-पत्र, पीपल की कोमल पत्ती, 5 लौंग, कपूर, घी, गुड़। आम की लकड़ी में हवन करे । इससे मन्त्र सिद्ध हो जायगा। सिद्ध हो जाने पर टोना टमानी, प्रेत-बाधा में 11 बार इसे पढ़कर फूंक मारे, तो ये सब दोष दूर होंगे । 11 बार जप करने से आत्म-रक्षा होती है।

शनिवार, 16 जुलाई 2022

Shree shabar-shakti path

श्री साबर-शक्ति-पाठ

श्री 'साबर-शक्ति-पाठ' के रचयिता  'अनन्त-श्रीविभूषित श्री दिव्येश्वर योगिराज' श्री शक्तिदत्त शिवेन्द्राचार्य नामक कोई महात्मा रहे । उनके उक्त पाठ की प्रत्येक पंक्ति रहस्य-मयो है। पूर्ण श्रद्धा-सहित पाठ करने वाले को सफलता निश्चित रूप से मिलती है, ऐसी मान्यता है। किसी कामना से इस 'पाठ' का प्रयोग करने के पहले तीन रात्रियों में लगातार इस पाठ की 111 आवृत्तियाँ 'अखण्ड दीप-ज्योति' के समक्ष बैठकर कर लेनी चाहिए। 

तदनन्तर निम्न प्रयोग-विधि के अनुसार निर्दिष्ट संख्या में निर्दिष्ट काल में भ० काली के विग्रह के सामने धूप-दीपादि सहित पाठ करने से अभीष्ट कामना की सिद्धि मिल सकेगी।

 

Shree shabar-shakti path
Shree shabar-shakti path

प्रयोग-विधि 

  1.   लक्ष्मी-प्राप्ति हेतु नैऋत्य-मुख-बैठकर दो पाठ नित्य करें।
  2.  सन्तान-सुख-प्राप्ति हेतु पश्चिम-मुख-बैठकर पाँच पाठ तीन मास तक करें। 
  3.  शत्रु-बाधा-निवारण हेतु ___ उत्तर-मुख-तीन दिन सायं काल ग्यारह पाठ करें
  4.  विद्या-प्राप्ति एवं परीक्षा उत्तीर्ण करने हेतु पूर्व-मुख-बैठकर तीन मास तक 3 पाठ करें।
  5.  घोर आपत्ति और राज-दण्ड-भय को दूर करने के लिए मध्य-रात्रि में नौ दिनों तक इक्कीस पाठ करें। 
  6.  असाध्य रोग को दूर करने के लिए सोमवार को एक पाठ, मङ्गलवार को तीन पाठ, शुक्रवार को दो पाठ और शनिवार को नौ पाठ करें।
  7.  नौकरी में उन्नति और व्यापार में लाभ पाने के लिए एक पाठ सबेरे और दो पाठ रात्रि में एक मास तक करें।
  8.   देवता के साक्षात्कार (दर्शन-लाभ) के लिए चतुर्दशी के दिन रात्रि में सुगन्धित धूप एवं अखण्ड दीप के सहित 200 पाठ करें। 
  9.  स्वप्न में प्रश्नोत्तर, भविष्य जानने के लिए रात्रि में उत्तर-मुख-बैठकर नौ पाठ करने से उसी रात्रि में स्वप्न में उत्तर मिलेगा, किन्तु सट्टा या तेजी-मन्दी जानने के लिए इस प्रयोग का उपयोग करने पर हानि होगी, इसका ध्यान रहे । 
  10.  विपरीत ग्रह-दशा और दैवी-विघ्न की निवृत्ति हेतु नित्य एक पाठ सदा श्रद्धा से करने पर विपरीत ग्रह-दशा और दैवी विघ्न कभी न होंगे । साथ ही क्रमशः उन्नति एवं सुख-समृद्धि में वृद्धि होगी-कभी किसी प्रकार की हानि न होगी।



पूर्व-पीठिका

। विनियोग ।। 

श्रीसाबर-शक्ति - पाठ का, भुजङ्ग - प्रयात है छन्द । 

भारद्वाज शक्ति ऋषि, श्रीमहा-काली काल प्रचण्ड । 

ॐ की काली शरण - वीज, है वायु- तत्त्व प्रधान । 

कलि प्रत्यक्ष भोग-मोक्षदा, निश-दिन धरे जो ध्यान ॥

॥ ध्यान ।। 

मेघ - वर्ण शशि मुकुट में, त्रिनयन पीताम्बर - धारी। मुक्त-केशी मद-उन्मत्त सिताङ्गी, शत-दल-कमल-विहारी ॥ गङ्गाधर ले सर्प हाथ में, सिद्धि हेतु श्री - सन्मुख नाचे। निरख ताण्डव छवि हँसत, कालिका 'वरं ब्रूहि' उवाच ॥

पाठ-प्रार्थना ॥ 

जय जय श्रीशिवानन्दनाथ ! भगवन्त भक्त-दुःख- हारी। करो स्वीकार साबर-शक्ति-पाठ, हे महा-काल-अवतारी ।।

साबर-शक्ति-पाठ

ॐ नमो जगदम्बा भवानी, करो सिद्ध कारज महरानी। त्रिभुवन महिमा तिहारी, जै श्रीजया गगन - विहारी॥ तेरे भक्त को दुःख न व्यापे, शाक्त से यम - राज भी काँपे । हनुमत वीर चलें अगुवानी, बाँएँ भैरव हैं महारानी ॥ पीछे वीरभद्र जब गरजें, दाएँ नृसिंह वीर हैं हर्षे । कलि प्रत्यक्ष प्रभाव तुम्हारा, जो सुमरे दुःख विनसे सारा ॥ रक्त-ननन से प्रगटी ज्वाला, कांप उठे सुरासुर दिग-पाला। बाहि-त्राहि भव-दुःख-भजन माता, कर जोर कहें सुर सिद्ध विधाता ॥ जब-जब धर्म पर सङ्कट आया, उठा त्रिशूल सब दुःख मिटाया। धर्म सनातन की माँ तुम रक्षक, पामर खल मानव दल भक्षक । भक्ति-पूर्ण हूँ शरण तुम्हारी, जय दुर्गे श्यामा शिव की प्यारी॥ 

श्रीरक्त-काली-समर्पणम् ।।१

ॐ नमो श्रीतारिणी क्लेश-हारिणी, भक्त-रक्षक माँ गगन-विहारिणी। कर खप्पर-खड्ग मुण्ड की माला, पाश गदा है भुजा विशाला ॥ मद-भरे नयन त्रिभुवन-जन मोहें, पायन सुवरन धुंघरू सोहें। राम-रूप तुमने जब धारा, भार भूमि सब असुर सँहारा॥ जल-सडूट-हर्ता बुद्धि की दाता, जय जय श्रीताराम्बा माता। वाहन मयूर कर वीणा बाजे, साम-वेद सून्दर ध्वनि गाजे॥ रूप कालिका घोर भयङ्कर, शाक्त जनों को लगता सुन्दर । मतवाली हो रण में धावे, दानव - दल तोहि देख घबरावे॥ वाहन सिंह चढ़ो अब श्यामा, द्वेष-संहार का बजे दमामा। उग्र प्यास भैरव की बुझाओ, कला कोटि नर-मेध रचाओ। उग्न - तारा है नाम तिहारा, धूम - केतु बन प्रगटो तारा। संहार करो कु-सृष्टि को काली, जय जय श्रीदुर्गे डमरू वालो। नहीं आँच तेरे भक्त को आवे, मदान्ध खलों की सत्ता मिट जावे। जब भी पाप बढ़ा है जग में,  काली-रूप हो मेटा क्षण में । भक्ति-पूर्ण कहता माँ तुझसे, पाप साम्राज्य उठा भू-तल से। 'धर्म की जय' हो गूंजे नारा, अखण्ड वर्ग धर्म रहे तुम्हारा॥ सत्य को शान्ति ब्रह्मचर्य व्रत, मातृ-भक्ति से रहे सदा रत। सहस्र-भुजे माँ दुर्ग-नन्दिनी, शिवा शाम्भवी दुष्ट-र्षिणी॥ त्रिपुर-मालिनी हे विन्ध्यवासिनी, भाल कुअङ्क विधि-लेख-नाशिनी। अष्ट-वीर योगिनी मङ्गल गावें,  शक्क तुम्हारा चंवर डुलावें ॥ मणि-द्वीप में राज भवानी, धन्य - धन्य माँ उमा महरानी। मुझे जगज्जये ! आशा तेरी, अष्ट-भुजे!भाग्य बदल दे मेरा ॥ जो सुमरे काली • तारा, पाप - त्रिताप भस्म हो सारा। चरण पाताल शीश कैलाशा, रूप विराट तोड़े यम-पाशा ॥ अनन्त रूप युग - युग में धारे, भक्त-जनों के काज सँवारे । त्रिभुवन-दानी श्रीनाद-नादिनी, रवि-शत-कोटि-प्रभा प्रकाशिनी ॥

श्रीतारा-समर्पणम् ।।२।।

ॐ नमो श्री षोडशी षण्मुख-जननि, सदा बसो मम हृदय वर-वणिनी। हूँ भक्ति-पूर्ण तेरा ही अंशी, वद्धित हो यह सत्कुल सद्-वंशी ॥ श्रीयन्त्र-राज-स्मरण को शक्ति, चरण-कमल की मां दे दो भक्ति। चक्र त्रिशूल खड्ग कमल धारे,

घन गर्जन कर राक्षस मारे ॥ अरुण वरण पद सुन्दर रूपा, ध्यावत जो नर होय सो भूपा। रवि-शशि लज्जित निरख पद-शोभा, सेवे शाक्त हृदय अति लोभा ॥ वि-भुवन-सुन्दरो वयस किशोरा, मोहे शिव ज्यों चन्द्र-चकोरा । स्तन अमृत - रस - भण्डारा, पीवत होय बुद्धि - बल-भारा ॥ जेहि पर कृपा तुम्हारी होई, स्तन - अमृत पावे सोई। करुणा-दृष्टि विलोके जोई, विश्व-विख्यात कवि सो होई ॥ जो भगवती षोडशी को ध्यावे, अक्षय आयुष-यौवन पावे। निर्द्वन्द विमल गति मति दाता, जय श्रोश्यामे ! त्रिभुवन भाग्य-विधाता ॥ पङ्कज आभा सुगन्ध शरीरा, श्याम-गात विविध रङ्ग चीरा। महिष-मद्दिनी अमित बल-शाली, जै-जै सती सिद्धिदा काली ॥ आसव-पान-मत्त अट-पट वाणी, शाक्त-मण्डल को सुख-खानी। जल-थल-नभ किलोल करन्ती, जय भद्रकाली माँ मम दुख-हन्त्री निर्धन सृष्टि-गत जो बालक तोरे, उनके शीघ्र बसा दे डेरे । संसार-इच्छुक जिनका मन, दे दो माँ उन्हें स्त्री-सुत-धन ॥ हूँ भक्ति-पूर्ण तेरे चरणों का भौंरा, तुमको नैना देखत चहुँ ओरा। भोग-मोह से भक्त यह है न्यारा, मन चाहत तव चरण-अधारा॥ ब्रह्मवादिनी ब्रह्म-ज्ञान दे, विमला विमल मति-विज्ञान दे। सावित्री सर्व-शोक-दुःख-हर्ता, मम जीवन-धन तू जग-भर्ता ॥ मम मात-पिता गुरु-बन्धु तुम पद्मा, तू गौरी सत् - असत् - रूपा माँ। रत्न-द्वीप की तुम महारानी, सिद्धि ऐश्वर्य दो मुझे भवानी॥ जहाँ जब सुमरूं प्रकट हो जाओ,. उठा त्रिशूल सब विघ्न मिटाओ। अटल छत्र है राज तुम्हारा, जो सुमरे हो भव-सिन्धु के पारा॥  

श्रीषोडशी-समर्पणम् ।।३॥

 ॐ नमो श्रीभुवनेश्वरी - परमेश्वरी, श्रीपार्वती माँ राजेश्वरी। श्रीकामदा काल-रात्रि एक-वीरा, तेज-स्वरूपिणी दुर्धर्ष - बल-धीरा ॥ ऋण-नाश-क! श्री-शक्ति तू है, माँ-माँ सुत पुकारे तू किधर है ? सर्वार्थ-दात्री नाम तेरा जग में, मेरी बार कहाँ भूली हो मग में ।। पुत्र हो कुपुत्र पर कु-माता न होवे, श्रीगङ्गा की धारा ज्यों पाप धोवे । मैं हूँ तेरा-आशा है सिर्फ तेरी, । भला या बुरा हूँ-पर माँ हो तुम मेरो॥ खड्ग-खप्पर - पाश-माला हाथ में, चलता है भैरव तेरे साथ में। जिधर भी मां नजर तूने फिराई, वहाँ ही बटुक जा करता सहाई ॥ शाकम्भरी श्रीपूर्णा गिरि-नन्दिनी, परमार्थ - शीले माँ  त्यानन्दिनी। क्षीर-सिन्धु किनारे बजाती हो वेणु, श्रीजयाम्बे तू ही मेरी कामधेनु ॥ दारिद्र - महिषासुर ने है घेरा, उठा त्रिशूल दुर्गे ! क्लेश मेटो मेरा । तू ही हरि-हर-विरञ्चि रूप शक्ति, जय श्रीश्यामा दे श्री-कोति-भक्ति॥ राज-रानी तेरे सिवा कौन दाता, मिटा दे बुरा जो लिखा हो विधाता। तेरे ही प्रताप से कुबेर धनेश्वर कहलाया, जयति जै श्री भुवने माया ॥

श्रीभुवनेश्वरी-समर्पणम् ।।४।।

 

ॐ नमो श्रीधूमावतो लीला-मयी, कलि प्रत्यक्ष तुम हो माहेश्वरी। जो चन्द्र-मण्डल में ध्यान धरते, पा कवित्व मोह - सिन्धु से तरते ॥ षण्मास जो तेरा स्वरूप ध्याता, पुष्प - धन्वो भी उससे हार जाता। पद्म-मालाएँ तेरे चरणों में धरता, विश्व-मण्डल का होता वह भर्ता ॥ तू ही अनेक रूपों से भासे, जो जान जाये-मृत्यु भी नासे । सिद्ध-विद्या तू अमृत - स्वरूपो, जिसके हृदय में वही है देव - रूपी॥ भ्रामरी भा. का मङ्गल-करी, जयन्ती जया तुम दुःख • हरी। त्रिगुण से परे है धाम तेर, सदा ही कल्याण करो माँ मेरा ।। तू ही पूर्णागिरीश्वरी कामेश्वरी, करुणा-मयी हो श्रीराज-राजेश्वरी। भूति-विभूति-दात्री श्री सती, भक्तों को देती हो श्री - कीति - गती॥ दिव्य - दृष्टि सिद्धश्वर्य - दाता, भक्ति - पूर्ण करूं मैं प्रणाम माता। तेरा ही गुण गाता रहता हूँ शाक्त, दया-मयी चाहता हूँ तेरी भक्ति । बिगाड़ो या बनाओ अधिकार तुमको, न होगा जरा भी मलाल मुझको। किश्ती ये कर दी माँ तेरे हवाले, चाहे डुबा दे या चाहे बचा ले ॥ तमन्नाओं की धूप देता हूँ तुमको, तेरे नाम से है इश्क मुझको। तेरी याद में माँ दिल आँसू बहाता, हठी मुसाफिर राह चलता जाता ।। पीताम्बरा चाहे जितना सता, कभी-न-कभी पाऊँगा तेरा पता। अभयङ्करी हे मणि - द्वीप - रानी, तेरी सेवा में रत हैं सिद्ध ज्ञानी ॥ त्रिशूल खप्पर गले मुण्ड - माला, मुक्त - केशी विनयन हैं विशाला। श्रीखेचरी गन्धर्व-लोक-दात्री, अष्टाङ्ग योग-वक्ता तू श्री - विधात्री ॥ पोला कमल - सा चरण तेरा, बना है जीवन का आधार मेरा। तेरी लीला श्री तू ही जाने, भक्त तो यथा - शक्ति गुण बखाने । कुलाचार से योगी करते हैं पूजा, तू ही तो ब्रह्म न और दूजा। मां-पुत्र सबसे बड़ा है नाता, पुत्र हो कु-पुत्र-न माता कु-माता ॥ इतना ही बस-मैं जानता हूँ, मानो न मानो-मैं मानता हूँ।

 

श्रीधूमावती-समर्पणम् ।।५।।

 

ॐ नमो श्रीभैरवी भूतेश्वरी, आनन्द - दाता त्वं ज्ञाने-मातेश्वरी। श्री वीर - विद्या चतुर्भुजा सोहे, पात्र नाग शूल पाश शत्रु मोहे ॥ श्मशाने निवासिनी श्यामा दिगम्बरा, माँ भैरवी भक्त-पालन-तत्परा। अस्थि-मुण्ड - माल त्रिनेत्र-कराला, चरणों में सोहत गुञ्ज - माला ॥ मद - मत्त हो तुम खिलखिलाती, आ - सेतु पृथ्वो काँप जाती। बिगड़ी को बनाता है नाम तेरा,
तव पटाम्बज में लिया के मन मेग। संग्राम में जीत पाए वही, जिस पर माँ ! तेरी छाया रही। जो हुआ जग में तेरे सहारे, उसका यम भी क्या बिगाड़े॥ मृत्युञ्जयो तू हृदय में जिसके, काल भी घबराता है उससे । मारकण्डे पर की तूने मेहर, हो गया उसो क्षण माँ ! वो अमर ॥ हनुमान ने जब स्तुति गाई, पा आशीर्वाद जा लङ्का जलाई। मेघनाद ने जब तुझे ध्याया, इन्द्र को जा बाँध लाया ॥ श्रीत्रिपुरा-चक्र-यज्ञ राम ने रचाया, तेरी कृपा से ही रावण मिटाया। श्री-तत्त्वागम जो नित्य ध्याता, कलि में वही भोग - मोक्ष पाता। विन्दु-शक्ति शिव पृथ्वी को, भैरव - रूप हो पावे। पाप-पुण्य से निर्द्वन्द होवे, नित्यानन्द - पद जावे ॥ चक्र - योग का विषय है, मैथन पात्र आनन्द । जो समझें शिव - रूप वे, नहीं तो पामर - वृन्द । विद्या - साधन अगम है, चलना तलवार को धार । गुरु - कृपा से सफलता, वरना टुकड़े होय हजार ॥ दिगम्बरा विपरीत - रति ध्यावे, या हो अमर या नरक में जावे। कुल - पथ अमृत - मय धारा, जिसमें कापालिक करें विहारा॥ भैरवी - भूतनाथ जपता जो नर, मन - वाञ्छित सिद्धि हो सत्वर ।

 

श्रीमहा-भैरवी-समर्पणम् ।।६।।

 

ॐ नमो श्रीबगलामुखी - स्वरूपा, शत्रु - संहार करो देवि ! अनूपा । धरण तेरे कोमल कमल - जैसे, जिसके हृदय में वही देव जैसे ॥ दुःख-शुम्भ ने आ घेरा है मुझको, मिटा क्लेश मैया भक्त कहे तुझको। पीताम्बरा श्रीअपराजिता तू कहाई, जभी भक्त सुमरे तू करती सहाई॥ गदा-चक्र-पाश - शङ्ख हाथों सोहे, चतुर्भुज रूप तेरा शिव को मोहे ।
योग - दीक्षा-हीन को न होता ज्ञान तेरा। पूर्णाभिषिक्त भी न जान पाएँ धाम तेरा ॥ जिस पर तेरी कृपा हो वही गुण - गान करता। दम्भी तन्त्र - साधक क्लेशित हो के मरता ॥ तेरे अनन्त रूपों ने की भक्त - रक्षा। तेरे वीर - भद्र सुत ने मारा था दक्षा ॥ कलि में महिमा - मयि ! व्यर्थ हैं कर्म सारे। भक्ति - पूर्ण हो जै-जै जयाम्बा पुकारे॥ तम -प्रबल युग में भ्रमित हैं कर्म - काण्डी। शुष्क वेदान्त छाँटें बक - वत् त्रि - दण्डी॥ वाक् - मनो - काय - निग्रह कोई न करते।
गृह - सदृश पलंग पर फल - फूल चरते ॥ जिधर देखा उधर ही सभी ब्रह्म- वक्ता। उपासना बिन स्वरूप - ज्ञान कैसा ॥ आहार - निद्रा - पट पृथ्वी-जल -चारी। कैसे हों माता सहस्रार - विहारी ? कहते कपिल सहस्रार हो आए। ईश्वर - सम शक्ति - प्रतिभा को पाए॥ नाभि - चक्क तक योगी जाता, अष्ट - सिद्धि - गुण प्रगट हो जाता। अनाहत - प्रकाश प्रत्यक्ष हो जाए, सहस्र - वर्ष आयु वह पाए । मैं तो स्वाधिष्ठान तक आया, अति अद्भुत देखी तेरी माया। मान-सरोवर त्रिकोण दिव्य सुन्दर, श्रीधाता-शारदा बैठे हैं कमल पर ॥ भुजङ्ग स्वर्ण-मयी महा-काम-स्वरूपा, नत-मस्तक हो पूजत सुर-भूपा। गायत्री प्रकृति श्री-यन्त्र मनोहर, श्रीशुभ्र-ज्योत्स्ने विश्व-मोहन कर॥ राज-राजेश्वरी अमित बल-शाली,
सर्वार्थ-पूर्ण-करी श्री-हंस-काली। श्रीदिव्य सिद्ध-धाम गुरु-रूप धरी, जै श्रीबगला शाक्त-मनोरथ पूर्ण करी॥ जिह्वा पकड़कर गदा उठाए, पाश डाल शत्रु को मिटाए। उन्मत्त नेत्र बक - वाहन सुहाए, भक्त - रक्षा हेतु शीघ्र ही धाए । सिद्ध - विद्या श्री स्तम्भिनी मङ्गला, करो त्राण मम भीमा चञ्चला। व्यक्षरी मन्त्र-मूर्ति माँ माहेश्वरी, कलि-प्रत्यक्ष फलदा तू परमेश्वरी ॥ भुक्ति-मुक्तिदा भक्त-शरण्ये, नमामि भजामि श्रीगिरि-राज - कन्ये ! श्रीचक्र-राज-शक्ति तुम कहाती, विधि का लिखा कु-अक्षर मिटातीं। सिद्ध-भक्ति-पूर्ण को है विश्वास तेरा, ब्रह्मास्त्र-मन्त्र-रूप है आधार मेरा। लोक-लाज-प्रपञ्च-कर्म त्यागा, श्रीबगला-चरण - कमल मन लागा॥

  श्रीबगलामुखी समर्पणम् ।।७।।


ॐ नमो श्रीत्रि पुर-सुन्दरी-चरणं, ब्रह्मादि - सेवित दारिद्रय - हरणम् । बुद्ध-देव - वन्दित दया - सागरी, वन - यान-वर्ग- पूज्ये श्रीकामेश्वरी॥ अमृत-पात्र-पद्म-इक्ष-धनुर्बाण - हस्ता। ताम्बूल-पूरित-मुखी श्रीस्वानन्द-मस्ता ॥ तृतीयावरण में बाला कहाई, शरण मैं तेरी-करो माँ सहाई ॥ त्रिपथगा त्रिवर्णाराध्य शक्ति, श्रीसुन्दरो दे पद - कमल-भक्ति। कम-दीक्षाचार-वणित श्रीभवानी, हे कुरङ्ग-नेत्री तू सर्व-सुख-दानी ॥ पद्मावतो सर्वाकर्षिणो कुरुकुल्ला, देखता हूँ तू ही है अहिल्या। कामेश्वर-प्रिया आद्या श्री-प्रसूता, पालन करती है तू विश्व-भूता ।। श्रीशताक्षरी दिव्य-कादि-हादि-मूर्ति, रहस्यार्थ-पूर्णे! तुम हो सर्व-पूर्ति । अभिनव गुप्त सुपूजित माहेश्वरी, सिद्ध नागार्जुन-वन्ध वागेश्वरी ॥ धाता हरि रुद्र शासन - करी, जयति जय श्रीमभयङ्करी। पञ्च-प्रेतासन-आरूढ़ा तू अम्बा, बिन्दु-मालिनी जय-जय सिद्धाम्बा ॥ कर्पूर-गौर - वर्णा श्रीकाकिनी, श्रीचक्रेश्वरी मदनातुरा लाकिनी। श्रीललिता लक्ष्मी काम-बीज-रूपा, करें प्रदक्षिणा ऋषि-देव-यक्ष-भूपा॥ राज- राजेश्वरि तू ही अन्नपूर्णा, श्रीपीठाधीश्वरी सर्वाभीष्ट-तूर्णा । अर्बुदाचल में अम्बिका कहाई, अष्ट - भुजा सिंह - वाहना कहाई॥ नील - वस्त्र - धारो सुकुमारी, जयति जयाज्ञा - चक्र - विहारी। अनङ्ग - मेखला है तेरा नाम, श्रीचक-राज प्रतिाबम्ब - मय धाम ॥ तू धरा धैर्य धर्म कर्म स्मृति, भक्तों को देती भोग औ सद् - गति । देखे चरण तेरे परमेश्वरो, हो गया तभी मुक्त श्रीमाहेश्वरी॥ पञ्चानन-प्रिया दुर्गमार्थ-दात्री, दुर्गतोद्धारिणी तुम हो विधात्री। वारुणी-प्रिया मद-मत्त-हासिनी, जय हेम - कूट-शिखरे विलासिनी॥ चन्द्र-बिम्बे प्रभा तू चतुर्वग-फलदा, एक - वीरा अपर्णा श्रीकामदा। महा-विद्या स्वयम्भू श्रीसुधा, त्रिभुवन-वशङ्करी हे रत्न - सुविधा ॥ माया-नृत्य-प्रवीणा गङ्गे नर्मदे, तू ही है सरस्वती विप्र - वरदे । काव्य-छन्द-गति ऋद्धि सन्मति, शाक्त - सेवित श्रीवामा त्रिमूर्ति ॥ रत्न-हार-भूषित नित्य यौवन-जया, भक्त को सदा दो अभय विजया। मधुमती-कला श्रीपार्वती सती, रहूँ तेरे प्रताप से मैं सत्य-व्रती ॥ निर्मला राधिका तू ही कालिका, है तेरा ही रूप तो हर-बालिका। कभी न विचलित हो मति मेरी, रहे सदा मुझ पर कृपा-दृष्टि तेरी॥


श्रीत्रिपुराम्बा समर्पणम् ।।८।।

 

ॐ नमो देवि ! मातङ्गी-पादारविन्दा, रक्ष-यक्ष-सेवित महा कवीन्द्रा । चतुर्भुजा-चण्ड-क्लेश-पाप-हन्त्री, भक्त-जनों की सदा जय-करन्ती ॥ शुक - क्रीड़ा - मग्न स्मित - मुखी, शीघ्र तेरा भक्त होता सुखी। चतुविशति-दल पर करे निवासा, धरे ध्यान होते छिन्न सभी पाशा॥नाव-गर्भा नारायण-पूजिता शुभा,मङ्गला भद्रा मक्त-कल्प-सुधा । रामेश्वरी रुद्र-प्रिया श्रीरागिनी, स्वर्ण-धुति-कुञ्जिका विन्ध्य-वासिनी॥ हेम-वन-माला-धारिणी श्रीरति, तेरे प्रताप से होऊँ पृथ्वी - पति । संग्राम-क्षेत्र में तू रमा करतो, प्रगट हो भक्तों के सङ्कट हरती ॥ शार्दूल-वाहना गले शङ्ख-माला, प्रज्वलित-नेत्रा पीती हो हाला। गन्धर्व-बालाएं करती गुण-गान, तेरे ही भक्त माँ धाता चक्र-वान ।। सूर्य-चन्द्र - वह्नि- रूप नेत्र तेरे, रहें सहायक सर्वदा माँ मेरे। जब भी समसहरो कष्ट मेरा, श्री जयाम्बे मुझे तो आधार तेरा ॥ हे नाग-लोक-पूज्या प्राण-दाता, भक्ति-पूर्वक करता नमस्कार माता।

 श्रीमहा-मातङ्गी समर्पणम् ।। ६ ।।

 ॐ विष्णु-प्रिया दिग्दलस्था नमो, विश्वाधार-जननि कमलायं नमो। वीजाक्षरों की तुम्ही सृष्टि करतीं, चरण-शरण भक्त के क्लेश हरतीं। सिन्धु - कन्या माया-बीज-काया, मोह - पाश से जग को श्रमाया । योगी भी हुए हैं हैरान तुमसे, कराओ अन्तर्बहिर्याग नित्य मुझसे ॥ न करता हूँ जाप-पूजा मैं तेरी, इतना ही जानता हूँ माँ तू मेरी। पन - चक्र - शङ्ख - मधु - पात्र धारे, विकट वीर योद्धा तूने सँहारे ॥ श्रीअपराजिता वैष्णवी नाम तेरा, माँ एकाक्षरी तू आधार मेरा। तू ही गुरु-गोविन्द करुणा-मयी, जै जै श्रीशिवानन्दनाथ-लीला-मयी। ऐरावत हैं शुण्डाभिषेक करते, दे प्रत्यक्ष दर्शन हे विश्व - भर्ते । योग - भोगदा रमा विष्णु - रूपा, मेरी कामधेनु काम - स्वरूपा ।। सिद्धेश्वर्य-दात्री हे शेष-शायी, करे दास बिनती करो माँ सहाई । पद्मा चञ्चला श्रीलक्ष्मी कहाई, पीताम्बरा तू गरुड़-वाहना सुहाई ॥ त्रिलोक - मोहन - करी कामिनी, जयति जय श्रीहरि - भामिनी । रुक्मिणी राज्ञी अर्थ-क्लेश-त्राता, जय श्रीधन - दात्री विश्व - माता॥ महा-लक्ष्मी लक्ष्मणा श्यामलाङ्गी, पद्म - गन्धा श्री श्रीकोमलाङ्गी। कालिन्दी कमले कर्म-दोष-हन्त्री, सुदर्शनीया ग्रीवा में माला वैजन्ती॥ 

श्रीमहा-लक्ष्मी कमला समर्पणम् ॥१०॥

 

गदा-खड्ग-खेट-खप्पर-नाग-चक - शूल - शङ्ख - पात्र हाथों में सोहे । जय महिषासुर-मदिनि चण्डिके, अष्टादश-भुजे विश्वम्भर-मन मोहे ॥ शाकम्भरी दुर्गा दुर्गमा कहलाती, भक्त-रक्षा हित प्रगट तू हो जाती। अमृत-दायिनी श्रोश्यामा सहोदरी, विद्युत्प्रभे तू सर्वार्थ - पूर्ण-करी॥ श्रीइन्द्राक्षी मणि-द्वीपे राज-रानी, जयति जय त्रिभुवन-विख्यात दानी । सर्व-मुद्रा-मयी खेचरी भूचरी, कुलजा कौलनी माधवी चाचरी॥ अगोचरी हो तुम कुल-कमलिनी, सहस्रार-शक्ति अर्द्ध-नारीश्वरी। इच्छा-क्रिया-ज्ञान-मूर्ति मातेश्वरी, श्रीविद्या तत्त्व-माता परमेश्वरी ॥ भवानी भग-मालिनी हेम-गर्भा परा, सदसत अद्वैत-जननि ऋतम्भरा। अहङ्कार-प्रकृति-स्व-स्वरूप-यजना, ब्रह्म-जननि वेद-माता गगन-वसना ॥ चतुष्पष्टि-तन्त्रागम-यामला, इनसे भी परे हो तुम चित्-कला। मातृका वह्निरन्तर्याग - माया, सिद्ध-सनकादि ने भी न भेद पाया ॥ चन-वेध से भी परे है धाम तेरा, नम्र-दिव्य-भावी हृदय में वास तेरा। मैं दीन भक्त तुम्हें कैसे मनाऊँ, दे चरण-भक्ति सदा गुण गाऊँ ॥ श्रीविन्ध्येश्वरी अजा वर-वणिनी, तेजस-तत्त्व-श्यामे तू अति गविणी। आधा अम्बिका तू है श्रीसुन्दरी, चन्द्र-भगिनी हेम-वदना किन्नरी ॥ तू ही तू है मां व्याप्त जग में, सर्वत्र तुमको ही देखता हूँ मग में। पाप-पुण्य से परे मैं हूँ तेरा, श्रीजयाम्बे मां ! तू मेरी मैं तेरा ॥ महा-काल के वचन से भूतल पर आया, तू शरीरी मैं हूँ तेरी छाया। तेरे ही बल से साबरी छन्द कहता, सर्व-शक्ति-दायो शत्रु-वंश-हन्ता । तीन मास ध्यावे दर्शन पावे, वाद - सम्वाद में सुर-गुरु को हरावे । साबरी - शक्ति-पाठ-वशी सुरेशा, सर्व-सिद्धि पावे साक्षी हों महेशा॥ त्रिवर्ण के हो लिए साबरो यह, म्लेच्छ जो पढ़े तो निवंश हो वह । साबरी अधीन हैं वीर हनुमान, उठो-उठो सिया- राम की आन ॥ अञ्जनि - सुत सुग्रीव के सङ्गी, करो काम मेरा वीर बजरङ्गी। तीन रात्रि में सिद्ध कर कामा, शपथ तोहे रघुपति की बल-धामा । अष्ट - भैरव रक्षण करें तन का, वीरभद्र विकास करें मन का। नसिंह वीर ! मम नेत्रों में रहना, जहाँ पुकारूँ सम्मोहित करना ।। सिद्ध साबरी है श्यामा का बाण, रुद्र - पाठ हरे शत्रु का प्राण । निशा साबरी श्मशान में गावे, नक्षत्र - पाठ जाग्रत हो जावे॥ वर्ष एक जो पढ़े तट गङ्गा, अर्द्ध - रात्रि में होकर असगा। ताके सङ्ग रहें भैरव - नाथा, राजा - प्रजा झुकावें माथा ॥ बारा वर्ष रटे साबरी हो ज्ञानी, सदा सङ्ग में रहें भवानी। हो इच्छा-जीवी योग-गति-ज्ञाना, निष्प्रयास प्राप्त हों सकल विज्ञाना॥ कहे सिद्धि-राज भक्त सुनो माँ काली ! शाबरी-शक्ति तुम्ही हो कराली। शाबरी- पाठ निन्दा जो करे, होय निवंश तन कीड़े पड़ें। शाक्त-रक्षिणी मम शत्रु-भक्षिणी, श्रीरक्त-कालि ! सब भय-दुःख-हरिणी। सिद्धि-भक्त यह चरणों में तेरे, 'कल्याण करो मेरा' बार - बार टेरे॥

 श्री चण्डी-समर्पणम् ॥११॥
॥ श्रीसाबर-शक्ति-पाठं सम्पूर्णं, शुभं भूयात् ।।


बुधवार, 23 मार्च 2022

shitla devi ka badha nashak mantra

 शीतला देवी का बाधा-नाशक मोहन-विधान

shitla devi ka badha nashak mantra
shitla devi ka badha nashak mantra
 
 

मन्त्र

मोहिनी-सोहनी बचके मारो । 

चलो मोहिनी, जग मोहो, संसार मोहो । 

राजा मोहो, परजा मोहो । 

सभा के बीच, पण्डित मोहो। 

इन्द्र की परी, दोहाई गौरा पारवती महादेव । 

ॐ क्रिया-क्रिया-क्रिया। पट्ट-पट्ट-पट्ट स्वाहा ।


विधि-शीतला देवी का पञ्चोपचार-पूजन कर उक्त मन्त्र का नित्य 5 बार 'जप' करे । पूजा में केसर, बताशा, कपूर, अगरबत्ती, नींबू, माला, फूल का प्रयोग करे । यह मोहन-विधान है। प्रेत-बाधा भी दूर होती है।


सोमवार, 14 जून 2021

अथ कीलक स्तोत्रम

अथ कीलक स्तोत्रम  


 विनियोगः- 

ॐ अस्य कीलकमंत्रस्य शिव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीमहासरस्वती देवता श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थं सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।।

 मार्कण्डेय उवाच :-

ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे ।।१।।
सर्वमेतद्विजानियान्मंत्राणामभिकीलकम् ।
सो-अपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ।।२।।

अथ कीलक स्तोत्रम
अथ कीलक स्तोत्रम  



मार्कण्डेय जी कहते हैं- विशुद्ध ज्ञान ही जिनका शरीर है, तीनों वेद ही जिनके तीन नेत्र हैं, जो कल्याण प्राप्ति के हेतु हैं तथा अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करते हैं, उन भगवान् शिव को नमस्कार है। मन्त्रों का जो अभिकीलक है अर्थात मन्त्रों की सिद्धि में विघ्न उपस्थित करने वाले शापरूपी कीलक का निवारण करने वाला है, उस सप्तशती स्तोत्र को सम्पूर्ण रूप से जानना चाहिए (और जानकर उसकी उपासना करनी चाहिए)।।१-२।।

सिध्यन्त्युच्याटनादीनि वस्तुनि सकलान्यपि।
एतेन स्तुवतां देवी स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्यति ।। ३।।
न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते।
विना जाप्येन सिद्ध्यते सर्वमुच्चाटनादिकम् ।।४।।

उसके भी उच्चाटन आदि कर्म सिद्ध होते हैं उसे भी समस्त दुर्लभ वस्तुओं की प्राप्ति होती है; तथापि जो अन्य मन्त्रों का जप न करके केवल इस सप्तशती नामक स्तोत्र से ही देवी की स्तुति करते हैं, उन्हें स्तुति मात्र से ही सच्चिदानन्दस्वरूपिणी देवी सिद्ध हो जाती हैं। उन्हें अपने कार्य की सिद्धि के लिये मंत्र, औषधि तथा अन्य किसी साधन के उपयोग की आवश्यकता नहीं रहती | बिना जप के उनके उच्चाटन आदि समस्त अभिचारिक कर्म सिद्ध हो जाते हैं ।।३-४।।

समग्राण्यपि सिद्धयन्ति लोकशङ्कामिमां हरः।
कृत्वा निमन्त्रयामास  सर्वमेवमिदं शुभम् ।।५।।
स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः।
समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावान्नियन्त्रणाम् ।।६।।

इतना ही नहीं ,उनकी संपूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ भी सिद्ध होती है | लोगों के मन में यह शंका थी कि 'जब केवल सप्तशती की उपासना से भी सामान रूप से अथवा सप्तशती को छोड़कर अन्य मंत्रो की उपासना से भी सामान रूप से सब कार्य सिद्ध होते है, अब इनमे श्रेष्ठ कौन सा साधन है?' लोगों की इस शंका को सामने रखकर भगवान् शंकर ने अपने पास आए हुए जिज्ञासुओं को समझाया की यह सप्तशती नामक संपूर्ण स्रोत ही सर्वश्रेष्ठ एवं कल्याणमय है तदनन्तर भगवती चण्डिकाके सप्तशती नामक स्त्रोत को महादेव जी ने गुप्त कर दिया; सप्तशती के पाठसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उसकी कभी समाप्ति नहीं होती; किंतु अन्य मंत्रो के जपजन्य पुण्य की समाप्ति हो जाती है, अतः भगवान् शिव ने अन्य मंत्रो की अपेक्षा जो सप्तशती की ही श्रेष्ठता का निर्णय किया उसे जानना चाहिए ।।५-६।।

सोअपि  क्षेममवाप्नोति  सर्वमेवं न संशयः।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ।।७।।
ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति।
इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम ।।८।।


अन्य मंत्रो का जप करनेवाला पुरुष भी यदि सप्तशती के स्त्रोत और जप का अनुष्ठान कर ले तो वह भी पूर्ण रूप से ही कल्याण का भागी होता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है, जो साधक कृष्णपक्ष की चतुर्दशी अथवा अष्टमी को एकाग्रचित होकर भगवती कीसेवा में अपना सर्वस्वा समर्पित कर देता है और फिर उसे प्रसाद रूप से ग्रहण करता है, उसी पर भगावती प्रसन्न होती है; अन्यथा उनकी प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती; इस प्रकार सिद्धि के प्रतिबंधक रूप कीलके द्वारा महादेव जी ने इस स्त्रोत को कीलित कर रखा है ।।७-८।।

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम्।
स सिद्धः स गणः सोअपि गन्धर्वो जायते नरः।।9।।
न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात् ।।१०।।

जो पूर्वोक्त रीति से निष्कीलन करके इस सप्तसती स्त्रोत का प्रतिदिन स्पष्ट उच्चारणपूर्वक पाठ करता है, वह मनुस्य सिद्ध हो जाता है, वही देवी का पार्षद होता है और वही गांधर्व भी होता है । सर्वत्र विचरते रहने पर भी इस संसार में उसे कहीं भी भय नहीं होता | वह अपमृत्यु के वश में नहीं पड़ता तथा देह त्यागने के अनन्तर मोक्ष प्राप्त कर लेता है।।9-10।।

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ।।११।।
सौभाग्यादि च यत्किञ्चित्त दृश्यते ललनाजने।
तत्सर्वं  तत्प्रसादेन तेन  जाप्यमिदं शुभम् ।।१२।।

अतः कीलन को जानकार उसका परिहार करके ही सप्तसती का पाठ आरंभ करे, जो ऐसा ही करता उसका नाश हो जाता है, इसलिए कीलकऔर निष्कीलन का ज्ञान प्राप्त करने पर ही यह स्त्रोत निर्दोष होता है और विद्वान् पुरुष इस निर्दोष स्तोत्र का ही पाठ आरंभ करते है। स्त्रियों में जो कुछ भी सौभाग्य आदि दृश्टिगोचर होता है, वह सब देवी के प्रसाद का ही फल है | अतः इस कल्याणमय स्त्रोत का सदा जप करना चाहिए ।।११-१२।।

शनैस्तु जप्यमाने-अस्मिन स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः।
भवत्येव  समग्रापि  ततः  प्रारभ्यमेव  तत् ।।१३।।
ऐश्वर्यं    यत्प्रसादेन   सौभाग्यारोग्यसम्पदः।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः।।ॐ।।१४।।

इस स्त्रोत का मंद स्वर से पाठ करने पर स्वल्प फल की सिद्धि है, अतः उच्च स्वर से ही इसका पाठ आरंभ करना चाहिए जिनके प्रसाद से ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य, सम्पत्ति, शत्रुनाश तथा परम मोक्ष की भी सिद्धि होती है, उन कल्याणमयी जगदम्बा की स्तुति मनसा क्यों नहीं करते ?

इति श्री देव्याः कीलकस्तोत्रम सम्पूर्णम्

शनिवार, 5 जून 2021

Aaso Devi ka Mantra

  Aaso devi ka mantra- आसो देवी का मन्त्र


Aaso Devi ka Mantra
Aaso Devi ka Mantra


 ॐ नमो आदेश गुरू का। आसो माता कहाँ से आई ? 

लाल घाटी के लाल नदी के लाल जलाल को साथ लाई। 

मरघट के मशान को लाई। घाट के घटिया को लाई। 

जगवा वीर व चौसठ योगिनी को लाई। एरानी मेरानी को डूडी सूखी। 

मेरानी को चार कोट । चौकड़ी को लाई। आकाश तोड़, पाताल फोड़। 

धूलम धूल उड़ाती आई जाएगी खनखनाती, आएगी खिलखिलाती। 

आधा घण्टा या पन्द्रह मिनट में मेरा काम नहीं करेगी, तो अपने बेटे व बहन का मांस खाएगी। 

नहीं तो आसो माता नहीं कहलाएगी।

विधि-

Ashu Mehatrani Shadhana आशु मेहतरानी साधना

काले उड़द 11, लौंग जोड़ा, काली राई सामने रखकर 41 दिन तक 41 बार उक्त मन्त्र जपे। आखिरी दिन आसो माता आएगी, शुद्धि और तीर्थ मांगेगी।


नोट:- ओर इन से सबन्ध मन्त्रो को जाने

Janjira mantra-जंजीरा मंत्र

हजरत अली की चौकी

अथ कीलक स्तोत्रम

संकट निवारण रामबोध मंत्र

हनुमान बाहुक का चमत्कारिक पाठ




शुक्रवार, 28 मई 2021

rajrajeshwari-kamla-mahavidya-sadhna

राजराजेश्वरी कमला साधना 



        सूर्य ग्रह 10 जून 2021 गुरुवार दोपहर 1:42 मिनिट से सांयकाल 4:41 तक इस दिन अवश्य करें   एक दिवसीय कमला साधना कीजिये

         क्या आप जानते है - अमावस्या के दिन सूर्य ग्रहण ओर पूर्णमा के दिन चंद्रग्रहण होता है, राहु से दूसरे, बारहवें, छटे, सातवें अथवा की राशि में सूर्य या चंद्र हो तो ग्रहण लगता है ! ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ब्रह्मा, चंद्र, इंद्र, कुबेर, वरुण, अग्नि और यम यह सात देवता ग्रहण के स्वामी होते है )


        इसलिये ग्रहण कल में अपने गुरु के मार्गदर्शन में लक्ष्मी साधना करना ही ज्यादा श्रेष्ठ होता है   ऐसी महामारी की विकट परिस्थिति में हर इंसान को सूर्य ग्रहण के समय आकस्मिक धन प्राप्ति के लिये "कमला साधना" ही करनी चाहिये  राजराजेश्वरी कमला ही है जो आकस्मिक धन प्राप्ति के स्रोत बनाती है , माँ भगवती लक्ष्मी का ये ऐसा रूप है जो भी व्यकि माँ के शरण में जायेगा उसे कभी भी निराश नही करती है यह मात्र एक दिवसीय साधना प्रयोग है  ! कोई लंबाचौड़ा विधि विधान भी नही , जिसे आसानी से संपन्न किया जा सकता है 
राजराजेश्वरी कमला साधना
राजराजेश्वरी कमला साधना 



        सम्पूर्ण जीवन का सौभाग्य है कमला साधना , मेरा मानना है कि हर व्यक्ति को जीवन में एक बार कमला साधना करनी चाहिए  दरिद्रता , गरीबी को घर से निकलना फैंकना है, अब मायूस विविश लाचार बन कर नही रहना है, आप भी धन पति कुबेर पति बने लोक कल्याण हितार्थ गोपनीय दुर्लभ विधि विधान के साथ जिसे हमारे देश के अनेक राजनेताओं उधोगपतियों ने इस साधना को सम्पन्न किया  जिसमें से कुछ नाम .. प्रदर्शित कर रहा हूँ , आदरणीय बाला साहब ठाकरे , पूर्वराष्ट्रपति महोदय महामहिम डॉ शंकर दयाल शर्मा और भी अनेक नेता ओर आज वो लोग बहुत बड़े उद्योगपति है जिनके शौर्य तेज प्रताप को आज तक कोई बीट नही कर पाया ! 

        लक्ष्मी का शुद्ध स्वरूप ही कमला है तंत्र जगत में लक्ष्मी की पूजा कमला स्वरूप में की जाती है, और लक्ष्मी से संबंधित पुर्ण तंत्र को कमला तंत्र कहा गया है !   दुर्लभः गोपनीय  श्री कमला ( राजराजेश्वरी ) महाविद्या की साधना आप सब के लिए जग ज़ाहिर कर रहा हूँ , जिससे आप सबका जीवन आनंदित ओर खुशहाल बन सके ! इस साधना को  सम्पन्न करने से व्यक्ति निश्चित ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर अनन्त , अलौकिक , वैभव, धन-धान्य सम्मान कीर्ति प्राप्त करते हुऐ भौतिक एश्वर्य ओर विशेष कर, राज सुख , शासन सत्ता को तो निश्चित ही भोगता है! 

इस साधना को करना ही भौतिक जीवन की पूर्णता है 

         यदि तांत्रोक्त दृस्टि से कमला साधना सम्पन्न की जाती है तो निश्चित ही साधक आश्चर्यजनक उपलब्धिया अनुभव करने लगता है, जो व्यक्ति तंत्र और पूजा पाठ के क्षेत्र में थोड़ी बहुत रुचि रखते है , वे कमला नाम से परिचित है, ओर वे यह भी जानते है कि यह तंत्र कितना महत्वपूर्ण और दुर्लभः है !एक प्रकार से देखा जाय तो कमला तंत्र हमेशा गोपनीय ओर दुर्लभः रहा है ! 

        सबसे बड़ी बात यह है, कि कमला साधना एक तरफ जहां पूर्व मानसिक , शान्ति और सिद्धि प्रदान करती है , वही दूसरी ओर इसके माध्यम से अतुलनीय वैभव और अनायास धन प्राप्ति होती रहती है !  मगर जो व्यक्ति पूर्ण निष्ठा के साथ इस कमला साधना को संपन्न कर लेता है , उसको समस्त सुख वैभव और सौभाग्य प्राप्त हो जाता है दरिद्रता तो हमेशा - हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है ! 

        दरिद्रता एवं दुःख को यदि जड़ से उखाड़ फेंकना हो, तो ग्रहण , श्रावण मास की हरियाली अमावस्या या किसी भी महीने की अष्टमी , शुक्रवार से कमला तंत्र वर्णित लक्ष्मी के मूल स्वरूप की ‘कमला साधना’ अवश्य सम्पन्न करें। इस साधना को जो भी साधक श्रेष्ठ मुहूर्त में पूर्ण विधि-विधान से करता है, उसके जीवन की दरिद्रता समाप्त हो जाती है और उसका दुर्भाग्य, सौभाग्य में परिवर्तित हो जाता है।
 

कमला यंत्र 


       तांत्रोक्त कमला साधना का मुख्य आधार कमला यंत्र ही है क्योंकि यह पूर्ण रूप से प्रभाव युक्त और सिद्धिदायक है। कमला तंत्र में यंत्र के बारे में बताया है, कि यह पूर्ण विधि के साथ षट्कोण सहित अष्टदलों युक्त यंत्र हो –
 
अनुक्तकल्पे यंत्रस्तु बलखेत्पद्मन्दलाष्टकम्।
षट्कोणकर्णिकतंत्र वेद्वाररोपशोभितम्॥
 
यह यंत्र ताम्र पत्र पर अंकित हो, साथ ही साथ कमला तंत्र में बताया गया है कि जब तक तंत्रोद्धार सम्पन्न यंत्र न हो तो उसका प्रभाव नहीं होता, तंत्रोद्धार में बारह तथ्य स्पष्ट किये गये हैं, बताया गया है कि इन तत्वों को सम्पन्न करके ही यंत्र का प्रयोग करना चाहिए जो पूर्ण रूप से मंत्र सिद्ध और प्राण प्रतिष्ठित हो ! 
 

कमला तंत्र के अनुसार
 
1. कमला यंत्र विजय काल में अंकित किया जाना चाहिए।
2. इसका पूर्ण रूप से मंत्रोद्धार हो।
3. यह वाग् बीज से सम्पुटित हो।
4. लज्जा बीज के द्वारा इसका अभिषेक हो।
5. श्रीं बीज के द्वारा यह यंत्र सिद्ध हो।
6. काम बीज के द्वारा यह वशीकरण युक्त हो।
7. पद्म बीज के द्वारा यह प्रभाव युक्त हो।
8. जगत् बीज के द्वारा यह आकर्षण युक्त हो।
9. रुद्र बीज के द्वारा वह शौर्य-वीर्य युक्त हो।
10. मनु बीज के द्वारा मन पर नियंत्रण प्रदान करने वाला हो।
11. ऐं बीज के द्वारा वैभव प्रदायक हो।
12. रमा बीज के द्वारा सिद्धि प्रदायक हो।
 
तारं पूर्व लिखित्वा परमलमलं वाग्भवं
बीजमन्य ल्लज्जा श्रीं बीज-पूर्ववश-
करण-तमं काम-बीजं परस्तात्।
ह् सौः पश्‍चाद् जनीयंनसूयुतमघः जगत्
पूर्विकायः प्रसूत्या हेन्तं रूपं तमोत्तं
निखिल-मनु- विदुर्मन्त्रमुक्तं रमायाः॥
 
          वास्तव में ही कमला यंत्र पूर्ण रूप से सिद्ध करना पेचीदा और श्रम साध्य कार्य है। इस प्रकार का यंत्र पूजा स्थान में स्थापित कर साधना प्रारम्भ करें। ऐसा यंत्र, जहां साधक के स्वयं के जीवन के लिए तो सौभाग्यदायक रहेगा ही, आने वाली कई-कई पीढ़ियों के लिए भी यह यंत्र भाग्योदयकारक बना रहेगा।
 

 कमला तंत्र - 
 
                वास्तव में लक्ष्मी की साधना तंत्र मार्ग से ही संभव है, और यह कमला साधना के द्वारा सहज संभव है। कमला तंत्र में तो स्पष्ट रूप से लिखा है कि जीवन में अतुलनीय धन-वैभव प्राप्त करने के लिए कमला साधना आवश्यक है, क्योंकि इस साधना के द्वारा ही जीवन में वह सब कुछ प्राप्त हो सकता है, जो कि आज के युग में मनुष्य को चाहिए।
 
                सबसे बड़ी बात यह है, कि कमला साधना एक ओर जहां पूर्ण मानसिक शांति और सिद्धि प्रदान करती है, वहीं दूसरी ओर इसके माध्यम से अतुलनीय वैभव और अनायास धन प्राप्ति होती रहती है, तंत्र में इसके द्वादश नाम स्पष्ट हुए हैं, यदि कोई साधक केवल इन द्वादश नामों का उल्लेख या उच्चारण ही नित्य कर लेता है, तो भी उसे पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है, फिर यदि कोई श्रावण मास, पुरुषोत्तम मास, कार्तिक मास, नवरात्रि या अन्य किसी शुभ मुहूर्त में एक बार भली प्रकार से कमला साधना सम्पन्न कर लेता है, तो उसके जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव रह ही कैसे सकता है?
 
    कमला के द्वादश नाम निम्नवत् हैं – 1. महालक्ष्मी, 2. ॠणमुक्ता, 3. हिरण्मयी, 4. राजतनया, 5. दारिद्र्य हारिणी, 6. कांचना, 7. जया, 8. राजराजेश्‍वरी, 9. वरदा, 10. कनकवर्णा, 11. पद्मासना, 12. सर्वमांगल्य युक्ता।
 
                          -:साधना विधान:-

         शास्त्रों में इस साधना को प्रातः काल सम्पन्न करना श्रेष्ठ बताया गया है। विविधत् मुहूर्तों के अनुसार समय परिवर्तित भी हो सकता है !
साधना प्रारम्भ करने से पूर्व मंत्र सिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त साधना सामग्री प्राप्त करले ! 
1, कमला यंत्र, 
2, द्वादश ज्योतिर्रत्न, 
3,  लक्ष्मी फल
4, राजराजेश्वरी माला
5, अष्ठ गंध 
6, शुध्द केसर 
7, लक्ष्मी आकर्षण धन वर्षा धूप

और पूजन सामग्री – जलपात्र, केसर, अष्टगंध, अक्षत, नारियल, फल, दूध का बना प्रसाद, पुष्प आदि अपने सामने रख दें ! कमला साधना में अष्टगंध, केसर का प्रयोग ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है, अतः साधकों को चाहिए कि वे पहले से ही अष्टगंध ओर केसर प्राप्त कर उसे घोल कर अपने सामने रख लें!
 
       कमला तंत्र के अनुसार साधना वाले दिन साधक स्नान, ध्यान कर पीले वस्त्र धारण कर पीले आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठ जाएं और अपने सामने एक बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर लक्ष्मी चित्र स्थापित कर दें !

पूजन के इस क्रम में सर्वप्रथम ‘मंत्र सिद्ध प्राणप्रतिष्ठा युक्त कमला यंत्र’ को शुद्ध जल से धो लें।  इसके पश्‍चात् कमला यंत्र को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से स्नान करायें। पंचामृत स्नान के पश्‍चात् पुनः शुद्ध जल से धोकर लक्ष्मी चित्र के सम्मुख रख दें !
 
इसके पश्‍चात् दोनों हाथ जोड़कर नवग्रहों की शांति हेतु प्रार्थना करें –
 

नवग्रह प्रार्थना –
 
ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्‍च गुरुश्‍च शुक्रः शनि राहुकेतवः सर्वेग्रहाः शांतिकरा भवन्तू !!

नवग्रह प्रार्थना के पश्‍चात् एक थाली में नया पीला वस्त्र बिछाकर उसे बाजोट पर रख दें, कपड़े के ऊपर सिन्दूर से सोलह बिन्दियां लगावें। सबसे ऊपर चार फिर उनके नीचे चार-चार बिन्दियां चार पक्तियों में, इस प्रकार कुल 16 बिन्दियां लगा कर प्रत्येक बिन्दी पर एक-एक लौंग तथा एक-एक इलायची रख कर, द्वादश ज्योतिर्रत्न से गोल घेरा बना कर , बाजोट के दाएं और बायीं तरफ लक्ष्मी फल को स्थापित करदें फिर इनका अष्टगंध से पूजन करें और हाथ जोड़ कर निम्न ध्यान मंत्र का उच्चारण करें –
 
उद्यन्मार्तण्ड-कान्ति-विगलित
कवरीं कृष्ण वस्त्रवृतांगाम्।
दण्डं लिंगं कराब्जैर्वरमथ
भुवनं सन्दधतीं त्रिनेत्राम्॥
नाना रत्नैर्विभातां स्मित-मुख
-कमलां सेवितां देव-देव-सर्वै
र्भार्यां रा ज्ञीं नमो भूत स-रवि-कल
-तनुमाश्रये ईश्‍वरीं त्वाम्॥
 
जो साधक संस्कृत पढ़े लिखे नहीं हैं, उनको चिंता नहीं करनी चाहिए और धीरे-धीरे शब्द उच्चारण करते हुए यह ध्यान मंत्र पढ़ सकते हैं।  इसके बाद मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठिायुक्त ‘कमला यंत्र’ पीले वस्त्र पर जिसमें सोलह बिन्दियां लगाई हैं, उसी पर पूर्ण श्रद्धा के साथ पुष्पों का आसन देकर स्थापित करें और अष्टगंध से इस यंत्र पर सोलह बिन्दियां लगा दें।
 
                 इसके पश्‍चात् कमला यंत्र के चारों ओर लक्ष्मी के द्वादश स्वरूप द्वादश ज्योतिर्रत्न का स्थापन करें। ये लक्ष्मी के महालक्ष्मी, ॠणमुक्ता, हिरण्मयी, राजतनया, दारिद्र्य हारिणी, कांचना, जया, राजराजेश्‍वरी, वरदा, कनकवर्णा, पद्मासना, सर्वमांगल्या द्वादश रूपों के प्रतीक हैं। कमला की इन द्वादश शक्तियों का पूजन अक्षत, कुंकुम, पुष्प इत्यादि से निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए करें –
 

ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं महालक्ष्मी स्थापयामि नमः।
ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं ॠणमुक्ता स्थापयामि नमः।
ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं हिरण्मयी स्थापयामि नमः।
ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं राजतनया स्थापयामि नमः।
ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं दारिद्र्य हारिणी स्थापयामि नमः।
ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं कांचना स्थापयामि नमः।
ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं जया स्थापयामि नमः।
ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं राजेश्‍वरी स्थापयामि नमः।
ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं वरदा स्थापयामि नमः।
ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं कनकवर्णा स्थापयामि नमः।
ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं पद्मासना स्थापयामि नमः।
ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं सर्वमांग्ल्या स्थापयामि नमः।
 

इसके बाद दोनों हाथों में पुष्प तथा अक्षत लेकर निम्न मंत्र से अपने घर में भगवती कमला का आह्वान करते हुए यंत्र पर पुष्प, अक्षत समर्पित करें ! और प्रार्थना करें कि चिरायु के लिए माँ कमला की सम्पूर्ण शक्ति हमारे शरीर में स्थापित हो सके 
 
आह्वान मंत्र
 
ॐ ब्रह्मा ॠषये नमः शिरसि। (सिर की स्पर्श करें)
 गायत्रीश्छन्दसे नमः मुखे। ( मुंख को स्पर्श करें )
श्री जगन्मातृ महालक्ष्म्यै देवतायै नमः हृदि। (हिर्दय को..)
श्रीं बीजाय नमः गुह्ये। ( नीचे स्पर्श करें )
सर्वेष्ट सिद्धये मम धनाप्तये ममाभीष्टप्राप्तये जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे। ( सम्पूर्ण शरीर को स्पर्श करें )
 हाथ धो लें 
 
इसके बाद साधक सामने शुद्ध घृत का दीपक जलाएं, उसका पूजन करें तत्पश्‍चात् सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करें, ऐसा करने के बाद साधक इस यंत्र पर कुंकुम समर्पित करें, पुष्प तथा पुष्प माला पहनाएं, अक्षत चढ़ावें तथा नैवेद्य का भोग लगावें, सामने ताम्बूल, फल और दक्षिणा समर्पित करें।
 
                भगवती कमला के आह्वान और पूजन के पश्‍चात् इस साधना में ‘कवच’ पाठ का विधान है। इस दुर्लभ कवच का पांच बार पाठ करें, जो महत्वपूर्ण है, कवच पाठ से यंत्र का साधक के प्राणों से सीधा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, और साधना सम्पन्न करने पर साधक को ओज, तेज, बल, बुद्धि तथा वैभव प्राप्त होने लग जाता है।

 इस कवच का उच्चारण सनत्कुमार ने भगवती लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए किया था। कमला उपनिषद् में इस लघु कवच का अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रयोग है –
 
कमला कवच
 
ऐंकारी मस्तके पातु वाग्भवी सर्व सिद्धिदा।
ह्रीं पातु चक्षुषोर्मध्ये चक्षु युग्मे च शांकरी।
जिह्वायां मुख-वृत्ते च कर्णयोर्दन्तयोर्नसि।
ओष्ठाधरे दन्त पंक्तौ तालु मूले हनौ पुनः॥
पातु मां विष्णु वनिता लक्ष्मीः श्री विष्णु रूपिणी।
कर्ण-युग्मे भुज-द्वये-रतन-द्वन्द्वे च पार्वती॥
हृदये मणि-बन्धे च ग्रीवायां पार्श्‍वयोर्द्वयोः।
पृष्ठदेशे तथा गृह्ये वामे च दक्षिणे तथा॥
स्वधा तु-प्राण-शक्त्यां वा सीमन्ते मस्तके तथा।
सर्वांगे पातु कामेशी महादेवी समुन्नतिः॥
पुष्टिः पातु महा-माया उत्कृष्टिः सर्वदावतु।
ॠद्धिः पातु सदादेवी सर्वत्र शम्भु-वल्लभा॥
वाग्भवी सर्वदा पातु, पातु मां हर-गेहिनी।
रमा पातु महा-देवी, पातु माया स्वराट् स्वयं॥
सर्वांगे पातु मां लक्ष्मीर्विष्णु-माया सुरेश्‍वरी।
विजया पातु भवने जया पातु सदा मम॥
शिव-दूती सदा पातु सुन्दरी पातु सर्वदा।
भैरवी पातु सर्वत्र भैरुण्डा सर्वदावतु॥
पातु मां देव-देवी च लक्ष्मीः सर्व-समृद्धिदा।
इति ते कथितं दिव्यं कवचं सर्व-सिद्धये॥
 

       वास्तव में ही यह कवच जो कि ऊपर स्पष्ट किया गया है अपने आप में महत्वपूर्ण है, यदि साधक नित्य इसके ग्यारह पाठ करता है, तो भी उसे जीवन में धन, वैभव, यश सम्मान प्राप्त होता रहता है।
 
 कमला कवच के पाठ के पश्‍चात् ऐश्वर्या लक्ष्मी मंत्रों से सिद्ध ‘राजराजेश्वरी कमला माला’ का कुंकुम, अक्षत, पुष्प इत्यादि से पूजन करें और पूजन के पश्‍चात् निम्न मंत्र की 16 माला मंत्र जप करें।

 

कमला मूल मंत्र
 
' ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं क्लीं ह् सौः जगत्प्रसूत्यै नमः !!"
 

जब सोलह माला मंत्र जप के बाद भगवती लक्ष्मी की विधि-विधान के साथ आरती सम्पन्न करें !

राजराजेश्वरी कमला एक दिवसीय साधना है , लेकिन जब भी कोई श्रेष्ठ महूर्त हो इस साधना को करते रहे,   आप को कुछ ही दिनों में आश्चर्यजनक जनक परिणाम मिलना शुरू हो जाते है ! 


सोमवार, 24 मई 2021

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काली-सहस्रनाम



शाक्ततंत्र सर्वसिद्धिप्रद है जिसमे करकादी स्तोत्र और कालिका सहस्त्रनाम का उल्लेख तिष्ण प्रभावशाली बताया गया है। कालिका सहस्रनाम का पाठ करने की अनेक गुप्त विधियाँ हैं, जो विभिन्न कामनाओं के अनुसार पृथक पृथक हैं और गुरु-परम्परा प्राप्त हैं । इस चमत्कारी एवं स्वयंसिद्ध कालीका सहस्त्रनाम का पाठ सिर्फ रात्रि मे ही करना अनुकुल माना जाता है।  क्युके रात्रि मे महाविद्याओ कि समस्त शक्तियाँ जाग्रत होती है और उन्हे साधक प्रसन्न करके मनचाहा वरदान प्राप्त कर सकता है। यहा एक गोपनीय विधान दे रहा हू,जो आसान है और फलदायी है।
kali-sahastranam-path
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 सर्वप्रथम लाल रंग के कपडे पर महाकाली जी का चित्र स्थापित करें। साधक स्वयं लाल वस्त्र धारण करे और लाल आसन का ही प्रयोग करे । हाथ मे किसी भी प्रकार का लाल पुष्प लेकर अपना कामना बोलकर पुष्प को मातारानी के चरणों मे समर्पित करें।  रुद्राक्ष माला से “क्रीं कालिके स्वाहा” मंत्र का एक माला जाप सहस्त्रनाम पाठ से पुर्व और अंत मे करे तो शीघ्र सफलता प्राप्त होता है। जब भी यह साधना करना हो तो मंगलवार या शनिवार से प्रारंभ करें। दक्षिण दिशा मे मुख करके पढ़ने से समस्त प्रकार के लाभ प्राप्त होते है,पश्चिम दिशा मे मुख करके पढ़ने से दारिद्रता नष्‍ट हो जाती है,पुर्व दिशा मे मुख करके पढ़ने से वाचन सिद्धि प्राप्त होती है और उत्तर दिशा मे मुख करके पढ़ने से मातारानी के दर्शन करना सम्भव है।

विनियोग

अस्य श्री श्मशानकालिका सहस्त्रनाम स्तोत्रस्य महाकाल भैरव ऋषिस्त्रिष्टुप छन्दः श्मशानजाली देवता ,
धर्मार्थ-काम-मोक्षार्थे ,अर्थ संतान सुख प्राप्त्यर्थे जपे विनियोगः|

काली-सहस्रनाम

श्मशान-कालिका काली भद्रकाली कपालिनी । गुह्य-काली महाकाली कुरु-कुल्ला विरोधिनी ।।१।।
कालिका काल-रात्रिश्च महा-काल-नितम्बिनी । काल-भैरव-भार्या च कुल-वर्त्म-प्रकाशिनी ।।२।।
कामदा कामिनी कन्या कमनीय-स्वरूपिणी । कस्तूरी-रस-लिप्ताङ्गी कुञ्जरेश्वर-गामिनी।।३।।
ककार-वर्ण-सर्वाङ्गी कामिनी काम-सुन्दरी । कामार्ता काम-रूपा च काम-धेनु: कलावती ।।४।।
कान्ता काम-स्वरूपा च कामाख्या कुल-कामिनी । कुलीना कुल-वत्यम्बा दुर्गा दुर्गति-नाशिनी ।।५।।
कौमारी कुलजा कृष्णा कृष्ण-देहा कृशोदरी । कृशाङ्गी कुलाशाङ्गी च क्रींकारी कमला कला ।।६।।
करालास्या कराली च कुल-कांतापराजिता । उग्रा उग्र-प्रभा दीप्ता विप्र-चित्ता महा-बला ।।७।।
नीला घना मेघ-नादा मात्रा मुद्रा मिताऽमिता । ब्राह्मी नारायणी भद्रा सुभद्रा भक्त-वत्सला ।।८।।
माहेश्वरी च चामुण्डा वाराही नारसिंहिका । वज्रांगी वज्र-कंकाली नृ-मुण्ड-स्रग्विणी शिवा ।।९।।
मालिनी नर-मुण्डाली-गलद्रक्त-विभूषणा । रक्त-चन्दन-सिक्ताङ्गी सिंदूरारुण-मस्तका ।।१०।।
घोर-रूपा घोर-दंष्ट्रा घोरा घोर-तरा शुभा । महा-दंष्ट्रा महा-माया सुदन्ती युग-दन्तुरा ।।११।।
सुलोचना विरूपाक्षी विशालाक्षी त्रिलोचना । शारदेन्दु-प्रसन्नस्या स्फुरत-स्मेताम्बुजेक्षणा ।।१२।।
अट्टहासा प्रफुल्लास्या स्मेर-वक्त्रा सुभाषिणी । प्रफुल्ल-पद्म-वदना स्मितास्या प्रिय-भाषिणी ।।१३।।
कोटराक्षी कुल-श्रेष्ठा महती बहु-भाषिणी । सुमति: कुमतिश्चण्डा चण्ड-मुण्डाति-वेगिनी ।।१४।।
प्रचण्डा चण्डिका चण्डी चर्चिका चण्ड-वेगिनी । सुकेशी मुक्त-केशी च दीर्घ-केशी महा-कचा ।।१५।।
प्रेत-देहा -कर्ण-पूरा प्रेत-पाणि-सुमेखला । प्रेतासना प्रिय-प्रेता प्रेत-भूमि-कृतालया ।।१६।।
श्मशान-वासिनी पुण्या पुण्यदा कुल-पण्डिता । पुण्यालया पुण्य-देहा पुण्य-श्लोका च पावनी ।।१७।।
पूता पवित्रा परमा परा पुण्य-विभूषणा । पुण्य-नाम्नी भीति-हरा वरदा खङ्ग-पाशिनी ।।१८।।
नृ-मुण्ड-हस्ता शस्त्रा च छिन्नमस्ता सुनासिका । दक्षिणा श्यामला श्यामा शांता पीनोन्नत-स्तनी ।।१९।।
दिगम्बरा घोर-रावा सृक्कान्ता-रक्त-वाहिनी । महा-रावा शिवा संज्ञा नि:संगा मदनातुरा ।।२०।।
मत्ता प्रमत्ता मदना सुधा-सिन्धु-निवासिनी । अति-मत्ता महा-मत्ता सर्वाकर्षण-कारिणी ।।२१।।
गीत-प्रिया वाद्य-रता प्रेत-नृत्य-परायणा । चतुर्भुजा दश-भुजा अष्टादश-भुजा तथा ।।२२।।
कात्यायनी जगन्माता जगती-परमेश्वरी । जगद्-बन्धुर्जगद्धात्री जगदानन्द-कारिणी ।।२३।।
जगज्जीव-मयी हेम-वती महामाया महा-लया । नाग-यज्ञोपवीताङ्गी नागिनी नाग-शायनी ।।२४।।
नाग-कन्या देव-कन्या गान्धारी किन्नरेश्वरी । मोह-रात्री महा-रात्री दरुणाभा सुरासुरी ।।२५।।
विद्या-धारी वसु-मती यक्षिणी योगिनी जरा । राक्षसी डाकिनी वेद-मयी वेद-विभूषणा ।।२६।।
श्रुति-र्स्मृतिर्महा-विद्या गुह्य-विद्या पुरातनी । चिंताऽचिंता स्वधा स्वाहा निद्रा तन्द्रा च पार्वती ।।२७।।
अर्पणा निश्चला लीला सर्व-विद्या-तपस्विनी । गङ्गा काशी शची सीता सती सत्य-परायणा ।।२८।।
नीति: सुनीति: सुरुचिस्तुष्टि: पुष्टिर्धृति: क्षमा । वाणी बुद्धिर्महा-लक्ष्मी लक्ष्मीर्नील-सरस्वती ।।२९।।
स्रोतस्वती स्रोत-वती मातङ्गी विजया जया । नदी सिन्धु: सर्व-मयी तारा शून्य निवासिनी ।।३०।।
शुद्धा तरंगिणी मेधा लाकिनी बहु-रूपिणी । सदानन्द-मयी सत्या सर्वानन्द-स्वरूपणि ।।३१।।
स्थूला सूक्ष्मा सूक्ष्म-तरा भगवत्यनुरूपिणी । परमार्थ-स्वरूपा च चिदानन्द-स्वरूपिणी ।।३२।।
सुनन्दा नन्दिनी स्तुत्या स्तवनीया स्वभाविनी । रंकिणी टंकिणी चित्रा विचित्रा चित्र-रूपिणी ।।३३।।
पद्मा पद्मालया पद्म-मुखी पद्म-विभूषणा । शाकिनी हाकिनी क्षान्ता राकिणी रुधिर-प्रिया ।।३४।।
भ्रान्तिर्भवानी रुद्राणी मृडानी शत्रु-मर्दिनी । उपेन्द्राणी महेशानी ज्योत्स्ना चन्द्र-स्वरूपिणी ।।३५।।
सुर्य्यात्मिका रुद्र-पत्नी रौद्री स्त्री प्रकृति: पुमान् । शक्ति: सूक्तिर्मति-मती भक्तिर्मुक्ति: पति-व्रता ।।३६।।
सर्वेश्वरी सर्व-माता सर्वाणी हर-वल्लभा । सर्वज्ञा सिद्धिदा सिद्धा भाव्या भव्या भयापहा ।।३७।।
कर्त्री हर्त्री पालयित्री शर्वरी तामसी दया । तमिस्रा यामिनीस्था च स्थिरा धीरा तपस्विनी ।।३८।।
चार्वङ्गी चंचला लोल-जिह्वा चारु-चरित्रिणी । त्रपा त्रपा-वती लज्जा निर्लज्जा ह्रीं रजोवती ।।३९।।
सत्व-वती धर्म-निष्ठा श्रेष्ठा निष्ठुर-वादिनी । गरिष्ठा दुष्ट-संहर्त्री विशिष्टा श्रेयसी घृणा ।।४०।।
भीमा भयानका भीमा-नादिनी भी: प्रभावती । वागीश्वरी श्रीर्यमुना यज्ञ-कर्त्री यजु:-प्रिया ।।४१।।
ऋक्-सामाथर्व-निलया रागिणी शोभन-स्वरा । कल-कण्ठी कम्बु-कण्ठी वेणु-वीणा-परायणा ।।४२।।
वंशिनी वैष्णवी स्वच्छा धात्री त्रि-जगदीश्वरी । मधुमती कुण्डलिनी शक्ति: ऋद्धि: सिद्धि: शुचि-स्मिता ।।४३।।
रम्भोर्वशी रती रामा रोहिणी रेवती रमा । शङ्खिनी चक्रिणी कृष्णा गदिनी पद्मनी तथा ।।४४।।
शूलिनी परिघास्त्रा च पाशिनी शार्न्ग-पाणिनी । पिनाक-धारिणी धूम्रा सुरभि वन-मालिनी ।।४५।।
रथिनी समर-प्रीता च वेगिनी रण-पण्डिता । जटिनी वज्रिणी नीला लावण्याम्बुधि-चन्द्रिका ।।४६।।
बलि-प्रिया महा-पूज्या पूर्णा दैत्येन्द्र-मन्थिनी । महिषासुर-संहन्त्री वासिनी रक्त-दन्तिका ।।४७।।
रक्तपा रुधिराक्ताङ्गी रक्त-खर्पर-हस्तिनी । रक्त-प्रिया माँस – रुधिरासवासक्त-मानसा ।।४८।।
गलच्छोणित-मुण्डालि-कण्ठ-माला-विभूषणा । शवासना चितान्त:स्था माहेशी वृष-वाहिनी ।।४९।।
व्याघ्र-त्वगम्बरा चीर-चेलिनी सिंह-वाहिनी । वाम-देवी महा-देवी गौरी सर्वज्ञ-भाविनी ।।५०।।
बालिका तरुणी वृद्धा वृद्ध-माता जरातुरा । सुभ्रुर्विलासिनी ब्रह्म-वादिनि ब्रह्माणी मही ।।५१।।
स्वप्नावती चित्र-लेखा लोपा-मुद्रा सुरेश्वरी । अमोघाऽरुन्धती तीक्ष्णा भोगवत्यनुवादिनी ।।५२।।
मन्दाकिनी मन्द-हासा ज्वालामुख्यसुरान्तका । मानदा मानिनी मान्या माननीया मदोद्धता ।।५३।।
मदिरा मदिरोन्मादा मेध्या नव्या प्रसादिनी । सुमध्यानन्त-गुणिनी सर्व-लोकोत्तमोत्तमा ।।५४।।
जयदा जित्वरा जेत्री जयश्रीर्जय-शालिनी । सुखदा शुभदा सत्या सभा-संक्षोभ-कारिणी ।।५५।।
शिव-दूती भूति-मती विभूतिर्भीषणानना । कौमारी कुलजा कुन्ती कुल-स्त्री कुल-पालिका ।।५६।।
कीर्तिर्यशस्विनी भूषां भूष्या भूत-पति-प्रिया । सगुणा-निर्गुणा धृष्ठा कला-काष्ठा प्रतिष्ठिता ।।५७।।
धनिष्ठा धनदा धन्या वसुधा स्व-प्रकाशिनी । उर्वी गुर्वी गुरु-श्रेष्ठा सगुणा त्रिगुणात्मिका ।।५८।।
महा-कुलीना निष्कामा सकामा काम-जीवना । काम-देव-कला रामाभिरामा शिव-नर्तकी ।।५९।।
चिन्तामणि: कल्पलता जाग्रती दीन-वत्सला । कार्तिकी कृत्तिका कृत्या अयोध्या विषमा समा ।।६०।।
सुमंत्रा मंत्रिणी घूर्णा ह्लादिनी क्लेश-नाशिनी । त्रैलोक्य-जननी हृष्टा निर्मांसा मनोरूपिणी ।।६१।।
तडाग-निम्न-जठरा शुष्क-मांसास्थि-मालिनी । अवन्ती मथुरा माया त्रैलोक्य-पावनीश्वरी ।।६२।।
व्यक्ताव्यक्तानेक-मूर्ति: शर्वरी भीम-नादिनी । क्षेमंकरी शंकरी च सर्व- सम्मोहन-कारिणी ।।६३।।
उर्ध्व-तेजस्विनी क्लिन्न महा-तेजस्विनी तथा । अद्वैत भोगिनी पूज्या युवती सर्व-मङ्गला ।।६४।।
सर्व-प्रियंकरी भोग्या धरणी पिशिताशना । भयंकरी पाप-हरा निष्कलंका वशंकरी ।।६५।।
आशा तृष्णा चन्द्र-कला निद्रिका वायु-वेगिनी । सहस्र-सूर्य संकाशा चन्द्र-कोटि-सम-प्रभा ।।६६।।
वह्नि-मण्डल-मध्यस्था च सर्व-तत्त्व-प्रतिष्ठिता । सर्वाचार-वती सर्व-देव – कन्याधिदेवता ।।६७।।
दक्ष-कन्या दक्ष-यज्ञ नाशिनी दुर्ग तारिणी । इज्या पूज्या विभीर्भूति: सत्कीर्तिर्ब्रह्म-रूपिणी ।।६८।।
रम्भीरुश्चतुरा राका जयन्ती करुणा कुहु: । मनस्विनी देव-माता यशस्या ब्रह्म-चारिणी ।।६९।।
ऋद्धिदा वृद्धिदा वृद्धि: सर्वाद्या सर्व-दायिनी । आधार-रूपिणी ध्येया मूलाधार-निवासिनी ।।७०।।
आज्ञा प्रज्ञा-पूर्ण-मनाश्चन्द्र-मुख्यानुकूलिनी । वावदूका निम्न-नाभि: सत्या सन्ध्या दृढ़-व्रता ।।७१।।
आन्वीक्षिकी दंड-नीतिस्त्रयी त्रि-दिव-सुन्दरी । ज्वलिनी ज्वालिनी शैल-तनया विन्ध्य-वासिनी ।।७२।।
अमेया खेचरी धैर्या तुरीया विमलातुरा । प्रगल्भा वारुणीच्छाया शशिनी विस्फुलिङ्गिनी ।।७३।।
भुक्ति सिद्धि सदा प्राप्ति: प्राकाम्या महिमाणिमा । इच्छा-सिद्धिर्विसिद्धा च वशित्वीर्ध्व-निवासिनी ।।७४।।
लघिमा चैव गायित्री सावित्री भुवनेश्वरी । मनोहरा चिता दिव्या देव्युदारा मनोरमा ।।७५।।
पिंगला कपिला जिह्वा-रसज्ञा रसिका रसा । सुषुम्नेडा भोगवती गान्धारी नरकान्तका ।।७६।।
पाञ्चाली रुक्मिणी राधाराध्या भीमाधिराधिका । अमृता तुलसी वृन्दा कैटभी कपटेश्वरी ।।७७।।
उग्र-चण्डेश्वरी वीर-जननी वीर-सुन्दरी । उग्र-तारा यशोदाख्या देवकी देव-मानिता ।।७८।।
निरन्जना चित्र-देवी क्रोधिनी कुल-दीपिका । कुल-वागीश्वरी वाणी मातृका द्राविणी द्रवा ।।७९।।
योगेश्वरी-महा-मारी भ्रामरी विन्दु-रूपिणी । दूती प्राणेश्वरी गुप्ता बहुला चामरी-प्रभा ।।८०।।
कुब्जिका ज्ञानिनी ज्येष्ठा भुशुंडी प्रकटा तिथि: । द्रविणी गोपिनी माया काम-बीजेश्वरी क्रिया ।।८१।।
शांभवी केकरा मेना मूषलास्त्रा तिलोत्तमा । अमेय-विक्रमा क्रूरा सम्पत्-शाला त्रिलोचना ।।८२।।
सुस्थी हव्य-वहा प्रीतिरुष्मा धूम्रार्चिरङ्गदा । तपिनी तापिनी विश्वा भोगदा धारिणी धरा ।।८३।।
त्रिखंडा बोधिनी वश्या सकला शब्द-रूपिणी । बीज-रूपा महा-मुद्रा योगिनी योनि-रूपिणी ।।८४।।
अनङ्ग – मदनानङ्ग – लेखनङ्ग – कुशेश्वरी । अनङ्ग-मालिनि-कामेशवरी देवि सर्वार्थ-साधिका ।।८५।।
सर्व-मन्त्र-मयी मोहिन्यरुणानङ्ग-मोहिनी । अनङ्ग-कुसुमानङ्ग-मेखलानङ्ग – रूपिणी ।।८६।।
वज्रेश्वरी च जयिनी सर्व-द्वन्द -क्षयंकरी । षडङ्ग-युवती योग-युक्ता ज्वालांशु-मालिनी ।।८७।।
दुराशया दुराधारा दुर्जया दुर्ग-रूपिणी । दुरन्ता दुष्कृति-हरा दुर्ध्येया दुरतिक्रमा ।।८८।।
हंसेश्वरी त्रिकोणस्था शाकम्भर्यनुकम्पिनी । त्रिकोण-निलया नित्या परमामृत-रञ्जिता ।।८९।।
महा-विद्येश्वरी श्वेता भेरुण्डा कुल-सुन्दरी । त्वरिता भक्त-संसक्ता भक्ति-वश्या सनातनी ।।९०।।
भक्तानन्द-मयी भक्ति-भाविका भक्ति-शंकरी । सर्व-सौन्दर्य-निलया सर्व-सौभाग्य-शालिनी ।।९१।।
सर्व-सौभाग्य-भवना सर्व सौख्य-निरूपिणी । कुमारी-पूजन-रता कुमारी-व्रत-चारिणी ।।९२।।
कुमारी-भक्ति-सुखिनी कुमारी-रूप-धारिणी । कुमारी-पूजक-प्रीता कुमारी प्रीतिदा प्रिया ।।९३।।
कुमारी-सेवकासंगा कुमारी-सेवकालया । आनन्द-भैरवी बाला भैरवी वटुक-भैरवी ।।९४।।
श्मशान-भैरवी काल-भैरवी पुर-भैरवी । महा-भैरव-पत्नी च परमानन्द-भैरवी ।।९५।।
सुधानन्द-भैरवी च उन्मादानन्द-भैरवी । मुक्तानन्द-भैरवी च तथा तरुण-भैरवी ।।९६।।
ज्ञानानन्द-भैरवी च अमृतानन्द-भैरवी । महा-भयंकरी तीव्रा तीव्र-वेगा तपस्विनी ।।९७।।
त्रिपुरा परमेशानी सुन्दरी पुर-सुन्दरी । त्रिपुरेशी पञ्च-दशी पञ्चमी पुर-वासिनी ।।९८।।
महा-सप्त-दशी चैव षोडशी त्रिपुरेश्वरी । महांकुश-स्वरूपा च महा-चक्रेश्वरी तथा ।।९९।।
नव-चक्रेश्वरी चक्रेश्वरी त्रिपुर-मालिनी । राज-राजेश्वरी धीरा महा-त्रिपुर-सुन्दरी ।।१००।।
सिन्दूर-पूर-रुचिरा श्रीमत्त्रिपुर-सुन्दरी । सर्वांग-सुन्दरी रक्ता रक्त-वस्त्रोत्तरीयिणी ।।१०१।।
जवा-यावक-सिन्दूर -रक्त-चन्दन-धारिणी । जवा-यावक-सिन्दूर -रक्त-चन्दन-रूप धृक ||१०२ ||
चामरी बाल-कुटिल-निर्मला-श्याम-केशिनी । वज्र-मौक्तिक-रत्नाढ्या-किरीट-मुकुटोज्ज्वला ।।१०३।।
रत्न-कुण्डल-संसक्त-स्फुरद्-गण्ड-मनोरमा । कुञ्जरेश्वर-कुम्भोत्थ-मुक्ता-रञ्जित-नासिका ।।१०४।।
मुक्ता-विद्रुम-माणिक्य-हाराढ्य-स्तन-मण्डला । सूर्य-कान्तेन्दु-कान्ताढ्य-स्पर्शाश्म-कण्ठ-भूषणा ।।१०५।।
वीजपूर-स्फुरद्-वीज -दन्त – पंक्तिरनुत्तमा । काम-कोदण्डकाभुग्न-भ्रू-कटाक्ष-प्रवर्षिणी ।।१०६।।
मातंग-कुम्भ-वक्षोजा लसत्कोक-नदेक्षणा । मनोज्ञ-शष्कुली-कर्णा हंसी-गति-विडम्बिनी ।।१०७।।
पद्म-रागांगद-ज्योतिर्दोश्चतुष्क-प्रकाशिनी । नाना-मणि-परिस्फूर्जच्दृद्ध-कांचन-कंकणा ।।१०८।।
नागेन्द्र-दन्त-निर्माण-वलयांचित-पाणिनी । अंगुरीयक-चित्रांगी विचित्र-क्षुद्र-घण्टिका ।।१०९।।
पट्टाम्बर-परीधाना कल-मञ्जीर-शिंजिनी । कर्पूरागरु-कस्तूरी-कुंकुम-द्रव-लेपिता ।।११०।।
विचित्र-रत्न-पृथिवी-कल्प-शाखि-तल-स्थिता । रत्न-द्वीप-स्फुरद-रक्त-सिंहासन-विलासिनी ।।१११।।
षट्-चक्र-भेदन-करी परमानन्द-रूपिणी । सहस्र-दल – पद्यान्तश्चन्द्र – मण्डल-वर्तिनी ।।११२।।
ब्रह्म-रूप-शिव-क्रोड-नाना-सुख-विलासिनी । हर-विष्णु-विरिंचिन्द्र-ग्रह – नायक-सेविता ।।११३।।
शिवा शैवा च रुद्राणी तथैव शिव-वादिनी । मातंगिनी श्रीमती च तथैवानन्द-मेखला ।।११४।।
डाकिनी योगिनी चैव तथोपयोगिनी मता । माहेश्वरी वैष्णवी च भ्रामरी शिव-रूपिणी ।।११५।।
अलम्बुषा वेग-वती क्रोध-रूपा सु-मेखला । गान्धारी हस्ति-जिह्वा च इडा चैव शुभंकरी ।।११६।।
पिंगला ब्रह्म-सूत्री च सुषुम्णा चैव गन्धिनी । आत्म-योनिब्र्रह्म-योनिर्जगद-योनिरयोनिजा ।।११७।।
भग-रूपा भग-स्थात्री भगनी भग-रूपिणी । भगात्मिका भगाधार-रूपिणी भग-मालिनी ।।११८।।
लिंगाख्या चैव लिंगेशी त्रिपुरा-भैरवी तथा । लिंग-गीति: सुगीतिश्च लिंगस्था लिंग-रूप-धृक ।।११९।।
लिंग-माना लिंग-भवा लिंग-लिंगा च पार्वती । भगवती कौशिकी च प्रेमा चैव प्रियंवदा ।।१२०।।
गृध्र-रूपा शिवा-रूपा चक्रिणी चक्र-रूप-धृक । लिंगाभिधायिनी लिंग-प्रिया लिंग-निवासिनी ।।१२१।।
लिंगस्था लिंगनी लिंग-रूपिणी लिंग-सुन्दरी । लिंग-गीतिमहा-प्रीता भग-गीतिर्महा-सुखा ।।१२२।।
लिंग-नाम-सदानंदा भग-नाम सदा-रति: । लिंग-माला-कंठ-भूषा भग-माला-विभूषणा ।।१२३।।
भग-लिंगामृत-प्रीता भग-लिंगामृतात्मिका । भग-लिंगार्चन-प्रीता भग-लिंग-स्वरूपिणी ।।१२४।।
भग-लिंग-स्वरूपा च भग-लिंग-सुखावहा । स्वयम्भू-कुसुम-प्रीता स्वयम्भू-कुसुमार्चिता ।।१२५।।
स्वयम्भू-पुष्प-प्राणा स्वयम्भू-कुसुमोत्थिता । स्वयम्भू-कुसुम-स्नाता स्वयम्भू-पुष्प-तर्पिता ।।१२६।।
स्वयम्भू-पुष्प-घटिता स्वयम्भू-पुष्प-धारिणी । स्वयम्भू-पुष्प-तिलका स्वयम्भू-पुष्प-चर्चिता ।।१२७।।
स्वयम्भू-पुष्प-निरता स्वयम्भू-कुसुम-ग्रहा । स्वयम्भू-पुष्प-यज्ञांगा स्वयम्भूकुसुमात्मिका ।।१२८।।
स्वयम्भू-पुष्प-निचिता स्वयम्भू-कुसुम-प्रिया । स्वयम्भू-कुसुमादान-लालसोन्मत्त – मानसा ।।१२९।।
स्वयम्भू-कुसुमानन्द-लहरी-स्निग्ध देहिनी । स्वयम्भू-कुसुमाधारा स्वयम्भू-कुसुमा-कला ।।१३०।।
स्वयम्भू-पुष्प-निलया स्वयम्भू-पुष्प-वासिनी । स्वयम्भू-कुसुम-स्निग्धा स्वयम्भू-कुसुमात्मिका ।।१३१।।
स्वयम्भू-पुष्प-कारिणी स्वयम्भू-पुष्प-पाणिका । स्वयम्भू-कुसुम-ध्याना स्वयम्भू-कुसुम-प्रभा ।।१३२।।
स्वयम्भू-कुसुम-ज्ञाना स्वयम्भू-पुष्प-भोगिनी । स्वयम्भू-कुसुमोल्लासा स्वयम्भू-पुष्प-वर्षिणी ।।१३३।।
स्वयम्भू-कुसुमोत्साहा। स्वयम्भू-कुसुमोन्मादा स्वयम्भू पुष्प-सुन्दरी ।।१३४।।
स्वयम्भू-कुसुमाराध्या स्वयम्भू-कुसुमोद्भवा । स्वयम्भू-कुसुम-व्यग्रा स्वयम्भू-पुष्प-पूर्णिता ।।१३५।।
स्वयम्भू-पूजक-प्रज्ञा स्वयम्भू-होतृ-मातृका । स्वयम्भू-दातृ-रक्षित्री स्वयम्भू-रक्त-तारिका ।।१३६।।
स्वयम्भू-पूजक-ग्रस्ता स्वयम्भू-पूजक-प्रिया । स्वयम्भू-वन्दकाधारा स्वयम्भू-निन्दकान्तका ।।१३७।।
स्वयम्भू-प्रद-सर्वस्वा स्वयम्भू-प्रद-पुत्रिणी । स्वम्भू-प्रद-सस्मेरा स्वयम्भू-प्रद-शरीरिणी ।।१३८।।
सर्व-कालोद्भव-प्रीता सर्व-कालोद्भवात्मिका । सर्व-कालोद्भवोद्भावा सर्व-कालोद्भवोद्भवा ।।१३९।।
कुण्ड-पुष्प-सदा-प्रीतिर्गोल-पुष्प-सदा-रति: । कुण्ड-गोलोद्भव-प्राणा कुण्ड-गोलोद्भवात्मिका ।।१४०।।
स्वयम्भुवा शिवा धात्री पावनी लोक-पावनी । कीर्तिर्यशस्विनी मेधा विमेधा शुक्र-सुन्दरी ।।१४१।।
अश्विनी कृत्तिका पुष्या तैजस्का चन्द्र-मण्डला । सूक्ष्माऽसूक्ष्मा वलाका च वरदा भय-नाशिनी ।।१४२।।
वरदाऽभयदा चैव मुक्ति-बन्ध-विनाशिनी । कामुका कामदा कान्ता कामाख्या कुल-सुन्दरी ।।१४३।।
दुःखदा सुखदा मोक्षा मोक्षदार्थ-प्रकाशिनी । दुष्टादुष्ट-मतिश्चैव सर्व-कार्य-विनाशिनी ।।१४४।।
शुक्राधारा शुक्र-रूपा-शुक्र-सिन्धु-निवासिनी । शुक्रालया शुक्र-भोग्या शुक्र-पूजा-सदा-रति:।।१४५।।
शुक्र-पूज्या-शुक्र-होमा-सन्तुष्टा शुक्र-वत्सला । शुक्र-मूर्ति: शुक्र-देहा शुक्र-पूजक-पुत्रिणी ।।१४६।।
शुक्रस्था शुक्रिणी शुक्र-संस्पृहा शुक्र-सुन्दरी । शुक्र-स्नाता शुक्र-करी शुक्र-सेव्याति-शुक्रिणी ।।१४७।।
महा-शुक्रा शुक्र-भवा शुक्र-वृष्टि-विधायिनी । शुक्राभिधेया शुक्रार्हा शुक्र-वन्दक-वन्दिता ।।१४८।।
शुक्रानन्द-करी शुक्र-सदानन्दाभिधायिका । शुक्रोत्सवा सदा-शुक्र-पूर्णा शुक्र-मनोरमा ।।१४९।।
शुक्र-पूजक-सर्वस्वा शुक्र-निन्दक-नाशिनी । शुक्रात्मिका शुक्र-सम्पत् शुक्राकर्षण-कारिणी ।।१५०।।
शारदा साधक-प्राणा साधकासक्त-मानसा । साधकोत्तम सर्वस्वा साधकाअभक्त रक्तपा ||१५१||
साधकानन्द-सन्तोषा साधकानन्द-कारिणी । आत्म-विद्या ब्रह्म-विद्या पर ब्रह्म स्वरूपिणी ||१५२||
त्रिकूटस्था पञ्चकूटा सर्व-कूट-शरीरिणी | सर्व-वर्ण-मयी देवी जप-माला-विधायिनी ।।१५३||

इसके बाद भूमि पर जल छोडकर, छोड़े हुये जल को तीन बार अपने हाथ से स्पर्श करके तीन बार अपने सर से लगा लें। काली सहस्त्रनाम का जप करने से सभी दुष्ट ग्रहों का स्तंभन होकर कुप्रभाव नष्ट हो जाता है। सभी प्रकार के भूत,प्रेत, आत्मा, चांडाल, पिशाच, काला जादू का प्रभाव नष्ट हो जाता है। सभी कामनाओं की सिद्धि होती है एवं सभी शत्रु स्वतः ही परास्त हो जाते हैं।

नोट:-  इन मंत्रो से सबन्धित मन्त्रो को ओर जाने


मंगलवार, 9 मार्च 2021

Kali Ekakshari Mantra purchaser vistrit Vidhan

महाकाली महिमा तथा काली एकाक्षरी मन्त्र पुरश्चरण बिस्तृत विधान 


काल अर्थात् समय/मृत्यु की अधिष्ठात्री भगवती महाकाली हैं। यूं तो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की रात्रि योगमाया भगवती आद्याकाली के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है। परंतु तान्त्रिक मतानुसार आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन 'काली जयंती' बतलायी गयी है। जगत के कल्याण के लिये वे सर्वदेवमयी आद्या शक्ति अनेकों बार प्रादुर्भूत होती हैं, सर्वशक्ति संपन्न वे भगवान तो अनादि हैं परंतु फिर भी भगवान के अंश विशेष के प्राकट्य दिवस पर उन स्वरूपों का स्मरण-पूजन कर यथासंभव उत्सव करना मंगलकारी होता है। दस महाविद्याओं में प्रथम एवं मुख्य महाविद्या हैं भगवती महाकाली। इन्हीं के उग्र और सौम्य दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दस महाविद्याएँ हैं। विद्यापति भगवान शिव की शक्तियां ये महाविद्याएँ अनन्त सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दार्शनिक दृष्टि से  भी कालतत्व की प्रधानता सर्वोपरि है। इसलिये महाकाली या काली ही समस्त विद्याओं की आदि हैं अर्थात् उनकी विद्यामय विभूतियाँ ही महाविद्याएँ हैं। ऐसा लगता है कि महाकाल की प्रियतमा काली ही अपने दक्षिण और वाम रूपों में दस महाविद्याओं के नाम से विख्यात हुईं। बृहन्नीलतन्त्र में कहा गया है कि रक्त और कृष्णभेद से काली ही दो रूपों में अधिष्ठित हैं। कृष्णा का नाम 'दक्षिणा' तथा रक्तवर्णा का नाम 'सुन्दरी' है।
Kali Ekakshari Mantra purchaser vistrit Vidhan
Kali Ekakshari Mantra purchaser vistrit Vidhan



साधना के द्वारा जब अहंता, ममता और भेद-बुद्धि का नाश होकर साधक में पूर्ण शिशुत्व उदित हो जाता है तब माँ काली का श्रीविग्रह साधक के समक्ष प्रकट हो जाता है। उस समय भगवती काली की छबि अवर्णनीय होती है। 

    कालिकापुराण में कथा है कि एक बार हिमालय पर अवस्थित मतंग मुनि के आश्रम में जाकर देवों ने महामाया की स्तुति की। स्तुति से प्रसन्न होकर मतंग-वनिता के रूप में भगवती ने देवताओं को दर्शन दिया और पूछा, "तुम लोग किसकी स्तुति कर रहे हो?" उसी समय देवी के शरीर से काले पर्वत के समान वर्ण वाली एक और दिव्य नारी का प्राकट्य हुआ । उस महातेजस्विनी ने स्वयं ही देवों की ओर से उत्तर दिया,"ये लोग मेरा ही स्तवन कर रहे हैं।" वे काजल के समान कृष्णा थीं, इसीलिये उनका नाम काली पड़ा।

     दुर्गासप्तशती के अनुसार एक बार शुम्भ-निशुम्भ के अत्याचार से व्यथित होकर देवताओं ने हिमालय पर जाकर देवीसूक्त के द्वारा देवी जी की स्तुति की। तब गौरी की देह से कौशिकी का प्रादुर्भाव हुआ। कौशिकी के अलग होते ही अम्बा पार्वती का स्वरूप कृष्ण हो गया, जो 'काली' नाम से विख्यात हुईं। माँ काली को नीलरूपा होने से तारा भी कहा जाता है। नारद-पाञ्चरात्र के अनुसार एक बार काली जी के मन में आया कि वे पुनः गौरी हो जायँ। यह सोचकर वे अन्तर्धान हो गयीं। शिवजी ने नारद जी से उनका पता पूछा। नारदजी ने उनसे सुमेरू के उत्तर में देवी के प्रत्यक्ष उपस्थित होने की बात कही। शिवजी की प्रेरणा से नारद जी वहाँ गये। उन्होंने देवी से शिवजी के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव सुनकर देवी क्रुद्ध हो गयीं और उनकी देह से एक अन्य षोडशी विग्रह प्रकट हो गया और उससे छायाविग्रह त्रिपुरभैरवी का प्राकट्य हुआ।

ओर जाने इनके बारे मे:-

                    
तान्त्रिक-मार्ग में यद्यपि काली की उपासना दीक्षागम्य है, तथापि अनन्य शरणागति द्वारा इनकी कृपा किसी को भी प्राप्त हो सकती है। मूर्ति, मन्त्र अथवा गुरु द्वारा उपदिष्ट किसी भी आधार पर भक्तिभाव से, मन्त्र-जप, पूजा, होम और पुरश्चरण करने से भगवती काली प्रसन्न हो जाती हैं।
भगवती काली के विभिन्न नामों का कारण -  

     सभी प्राणियों को अपने में समेट लेने के कारण शिव जी का महाकाल नाम है, उन महाकाल को भी अपने में समेट लेने के कारण कालिका देवी का आद्याकाली नाम है। परबह्म की नित्या क्रियाशक्ति का नाम काली है। निष्क्रिय परब्रह्म का सक्रिय रूप ही देवी काली हैं। विश्व के रूप में प्रकट होने वाली क्रिया शक्ति ही काली महाविद्या है। कालिका माँ ही समस्त तत्वों का कारण रूप हैं, ये देवी ही ईश्वर तत्व हैं, भगवती काली ही भगवान शिव का शरीर हैं। बाहर की ओर उन्मुख होते हुए भी यह अपने ऊपर ही स्थित हैं। भगवान शिव और उन पर स्थित उनकी क्रिया शक्ति भगवती काली एक ही तत्व के ही दो नाम हैं। सबका आरम्भ रूप होने से और सबको अपने में समेट लेने के कारण इनका आद्याकाली नाम है। ये अकथनीय होने के कारण काली कहलाती हैं। साकार होने पर भी निराकार होने के कारण इनका काली नाम है। भगवती काली ही कर्ता, हर्ता और पालन करने वाली हैं। निर्वाण तन्त्र के अनुसार दक्षिण दिशा का स्वामी यम काली नाम सुनकर भाग जाता है। काली महाविद्या का नाम लेने वाले अर्थात् कालिका उपासक को यम नरक नहीं ले जा सकता है, इसी कारण इन भगवती का नाम दक्षिणाकाली है। श्री दक्षिणामूर्ति भैरव द्वारा देवी काली की सर्वप्रथम आराधना की गयी इस कारण इनका नाम दक्षिणाकाली विख्यात हुआ। शक्तिसंगम तन्त्र के अनुसार "वरदानेषु चतुरा तेनेयं दक्षिणा स्मृता।" अर्थात् वरदान देने में भगवती बड़ी चतुर हैं इसलिए दक्षिणा कहलाती हैं।

कालिकायै च विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नो अघोरा प्रचोदयात्॥  इसका भाव है- मैं भगवती काली का स्मरण करता हूँ और उन श्मशानवासिनी का ही ध्यान करता हूँ। वे अघोरा हमारी चित्तवृत्ति को अपनी ही लीला में लगाये रखें।

काली महाविद्या के मन्त्र
महाकाली जी का ध्यान मन्त्र इस प्रकार है-

खड्गं चक्रगदेषुचाप-परिघाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः
शङ्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्ग-भूषावृताम्।
नीलाश्मद्युतिमास्य-पाददशकां सेवे महाकालिकां
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम्॥
  
 अर्थात् भगवान् विष्णु के सो जाने पर मधु-कैटभ को मारने के लिये कमलजन्मा ब्रह्माजी ने जिनका स्तवन किया था, उन महाकाली देवी का मैं सेवन(स्मरण) करता हूँ। वे अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शंख धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे समस्त अंगों में दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं। उनके शरीर की कान्ति नीलमणि के समान है और वे दस मुख एवं दस पैरों से युक्त हैं।

एक बार शुम्भ-निशुम्भ के अत्याचार से व्यथित होकर देवताओं ने हिमालय पर जाकर देवीसूक्त के द्वारा देवी जी की स्तुति की। तब गौरी की देह से कौशिकी का प्रादुर्भाव हुआ। कौशिकी के अलग होते ही अम्बा पार्वती का स्वरूप कृष्ण हो गया, जो 'काली' नाम से विख्यात हुईं। काली को नीलरूपा होने से तारा भी कहा जाता है।

     यूं तो महाकाली के अनेकों मन्त्र हैं। कई मन्त्र क्लिष्ट हैं तो कई गुरु दीक्षा के अभाव में हानि भी पहुंचा सकते हैं। अतः माँ के सरल मन्त्र ही प्रस्तुत कर रहा हूँ। मंत्र जप की महिमा से ध्यान करने की महिमा अधिक है अतः सामान्य आराधकों को माँ काली के ध्यान को अर्थ सहित बार-बार उच्चारण करते हुए माँ काली के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। शनिवार को माँ काली की पूजा विशेष रूप से की जाती है।

॥काली काली महाकाली कालिके परमेश्वरी सर्वानन्द करे देवि नारायणि नमोस्तुते॥
इसका भाव है- हे महाकाली! सभी को आनन्द  देने वाली परमेश्वरी नारायणी, आपको नमस्कार है।

॥ॐ कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नोऽघोरा प्रचोदयात्॥ 

यह काली गायत्री मन्त्र है, इसका भाव है- हम भगवती काली को जानते हैं और उन श्मशान में  
निवास करने वाली का ही ध्यान करते हैं। वे (अ)घोरा हमको अपने ज्ञान-ध्यान में प्रवृत्त करें।

यहाँ देवी काली का घोरा या अघोरा दोनो अर्थ हो सकता है। अघोरा अर्थात् जो भयानक रूप वाली न हो। देवी मां दुष्ट जनों को भयानक रूप प्रदर्शित करके भय देने वाली हैं परन्तु भक्त के लिए तो माँ के समान होने से देवी काली का कोई भी रूप सौम्य ही है। ध्यान रहे कि उपरोक्त मन्त्र में तन्नोऽघोरा में ऽ चिह्न प्लुत स्वर के उच्चारण के लिए प्रयुक्त हुआ है। अर्थात् तन्नो में ओ की मात्रा को थोड़ा लम्बा खींचना होगा फिर घोरा बोले। जैसे ओऽम् का उच्चारण होता है। केवल तन्नोघोरा बोलना भी मान्य है।

।।क्रीं।।

     यही 'क्रीं'-कार महाविद्या काली का सरल एकाक्षरी बीजमन्त्र है। इसका अधिकाधिक मानसिक जप करना घोर संकटों से मुक्ति दिलाता है। तोड़ल तन्त्र कहता है कि क्रीं बीज में स्थित क अक्षर धर्म दायक है, र अक्षर कामदायक है। 'ई'कार धनदायक है और 'म' कार मोक्षदायक है। इन सबका एक साथ उच्चारण करना निर्वाण-मोक्ष प्रदान करता है।
एकाक्षरी कालिका मन्त्र पुरश्चरण विधि

सामग्री : शिव मूर्ति चित्र या शिवलिंग, गणेश मूर्ति या चित्र, कालिका मूर्ति/चित्र/यन्त्र, रुद्राक्ष माला, रोली-चन्दन, जल, फूल, धूप-दिया, फल-नैवेद्य ।

(1) आचमन, पवित्रीकरण, आसन शुद्धि करे। जिसका गुरु हो वो गुरु पूजन करे। जिसका गुरु नहीं हो वह अपने सामने रखे शिवलिंग या शिव मूर्ति/चित्र को श्रीदक्षिणामूर्ति शिवजी जानकर और अपना गुरु मानकर पूजा करे -
श्री दक्षिणामूर्ति गुरू ध्यान :- मौन-व्याख्या-प्रकटित परब्रह्म-तत्त्वं युवानं, वर्षिष्ठान्ते-वसदृषि-गणै-रावृतं ब्रह्मनिष्ठैः ।
आचार्येन्द्रं करकलित - चिन्मुद्रमानन्दरूपं , स्वात्मारामं मुदितवदनं श्रीदक्षिणामूर्ति-मीडे ॥
(ब्रह्मनिष्ठ ऋषियों से घिरे युवा गुरु मौन रह कर ब्रह्म ज्ञान प्रदान कर रहे हैं । अपने हाथ की ज्ञान मुद्रा द्वारा उपदेश करते हुए ऐसे आनन्दरूप गुरुओं के गुरु दक्षिणामूर्ति जी को मैं प्रणाम करता हूं ।)
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

अब गुरु पूजा करे - 

ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ श्री दक्षिणामूर्ति गुरवे नमः, क्रीं लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं अनुकल्पयामि ।  चन्दन चढा दे

ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ, श्री दक्षिणामूर्ति गुरवे नमः, क्रीं हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं अनुकल्पयामि। फूल चढा दे

 ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ, श्री दक्षिणामूर्ति गुरवे नमः,  क्रीं यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं अनुकल्पयामि। धूप जला दे

ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ श्री दक्षिणामूर्ति गुरवे नमः, क्रीं  रं वह्नयात्मकं दीपं अनुकल्पयामि । दीप दिखा दे

ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ   श्री दक्षिणामूर्ति गुरवे नमः, क्रीं वं अमृत-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं अनुकल्पयामि। नैवेद्य चढा दे

ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ,  श्री दक्षिणामूर्ति गुरवे नमः॥ क्रीं सं सर्व-तत्त्वात्मकं सर्वोपचारं मनसा परिकल्प्य समर्पयामि। फूल चढा दे

नमस्कार करके गुरु से श्रीकालिका जप-पूजन की आज्ञा देने की प्रार्थना करें -

अनेकजन्म-संप्राप्त कर्मबन्ध-विदाहिने। आत्मज्ञान-प्रदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
स्मित-धवल-विकसिताननाब्जं श्रुति-सुलभं वृषभाधिरूढ-गात्रम्। सितजलज-सुशोभित-देहकान्तिं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे ,
त्रिभुवन-गुरुमागमैक-प्रमाणं त्रिजगत्कारण-सूत्रयोग-मायम्। रविशत-भास्वरमीहित-प्रधानं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे ।
अखण्ड-मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ,
निरवधि-सुखमिष्ट-दातारमीड्यं नतजन-मनस्ताप-भेदैक-दक्षम् । भव-विपिन-दवाग्नि-नामधेयं सततमहं दक्षिणामूर्तिमीडे ।
ज्ञानशक्ति-समारूढ़ः तत्त्वमाला-विभूषितः । भुक्तिमुक्ति-प्रदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
 ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ, श्रीगुरो दक्षिणामूर्ते भक्तानुग्रह-कारक। अनुज्ञां देहि भगवन् श्रीकालिका-जपार्चनस्य मे॥

अब गुरु मन्त्र 11 बार जपे : ॐ अं नमः शिवाय अं ॐ 

(2) गणेशजी की मूर्ति/चित्र पर फूल चढाकर ध्यान करे= 

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय, लम्बोदराय सकलाय जगत् हिताय। नागाननाय श्रुतियज्ञभूषिताय, गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ॥ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।
लम्बोदर नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रियं। निर्विघ्न कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।

ॐ श्री गणेशाय नमः लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं अनुकल्पयामि । चन्दन चढ़ा दे
ॐ श्री गणेशाय नमः हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं अनुकल्पयामि । फूल चढ़ाए
ॐ श्री गणेशाय नमः यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं अनुकल्पयामि। धूप जलाए
 ॐ श्री गणेशाय नमः रं वह्नयात्मकं दीपं अनुकल्पयामि । दीप दिखाए
ॐ श्री गणेशाय नमः वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं अनुकल्पयामि । (फल / बताशा आदि नैवेद्य में रखे )
ॐ श्री गणेशाय नमः शं शक्त्यात्मकं सर्वोपचारं अनुकल्पयामि । फूल चढ़ाए।

अब गणेश जी को नमस्कार करे :
सर्व-विघ्नविनाशनाय सर्व-कल्याण-हेतवे, पार्वती-प्रियपुत्राय श्रीगणेशाय नमो नम: ।। गजानन-म्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारु-भक्षणम्।
उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर-पादपंकजम्।

(3) अब हाथ में फूल लेकर बोले - 

ॐ भैरवाय नमः, अतितीक्ष्ण महाकाय कल्पांत दहनोपम, भैरवाय नमस्तुभ्यं अनुज्ञां दातुमर्हसि।
फूल शिवजी को चढा दे। अब इष्टदेवी काली माँ का चित्र/मूर्ति/यन्त्र सामने रखकर उनको प्रणाम करे :-
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
ॐ काली महाकाली कालिके परमेश्वरी । सर्वानन्दकरे देवी नारायणि नमोऽस्तुते ।।

(4) पुरश्चरण का संकल्प करे :

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: ॐ तत्सत् श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णुराज्ञया प्रवर्तमानस्य श्रीब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे भूप्रेदेशे------प्रदेशे ------मासे --------पक्षे , ----तिथौ, -----वासरे ------गोत्रोत्पन्न ------(नाम) अहं अद्य दिवसात प्रारभ्य पन्चविन्शति दिवस पर्यन्तम् श्रीकालिका देवी प्रीतये एकाक्षरी “क्रीं” मन्त्रस्य पुरश्चरणांतर्गते एक लक्ष जपम् कृत्वा तत्दशांशं होमं, होमस्य दशांशं तर्पणं, तर्पणस्यदशांशं मार्जनं, मार्जनस्य दशांशं ब्राह्मणान् कन्यान् वा सुवासिनीन् वा भोजयिष्ये।

(5) अब “क्रीं” मन्त्र से प्राणायाम करे =

 मन में 4 बार क्रीं जपकर नाक से श्वास अंदर को ले, अब 16 बार मन्त्र जपने तक श्वास को भीतर रोके रखे इसके बाद 8 बार जपते हुए श्वास बाहर निकाले। ये प्राणायाम कुल तीन बार करना है।

(6)अब भूतशुद्धि(शरीर स्थित पंचतत्वों की शुद्धि) करे अर्थात "ॐ हौं" मन्त्र का 11 बार जप करे।

(7) दृष्टिसेतु : नासाग्र अथवा भ्रूमध्य में दृष्टि रखते हुए १० बार ॐ का जप करे। प्रणव के अनाधिकारी औं मन्त्र का १० बार जप करे।

(8) मन्त्र शिखा : श्वास को भीतर लेकर कल्पना करे कि अपने मूलाधार में स्थित कुलकुण्डलिनी शक्ति क्रीं मन्त्र की शिखा है, यह सहस्रार में जा रही है फिर इसको कल्पना द्वारा सहस्रार से वापस मूलाधार में ले आये। इस तरह से कई दिन अभ्यास करते करते सुषुम्ना पथ पर विद्युत की तरह दीर्घाकार तेज प्रतीत होगा।

(9) मन्त्र चैतन्य : "गुरुदेव,  मन्त्र, काली माँ और अन्तरात्मा सब एक ही हैं" यह सोचे फिर “ईं क्रीं ईं” मन्त्र को 11 बार जपे।

(10) माँ काली का कवच  पढ़े -

||नारायण उवाच||
श्रृणु वक्ष्यामि विप्रेन्द्र कवचं परमाद्भुतम्।
नारायणेन यद् दत्तं कृपया शूलिने पुरा॥
त्रिपुरस्य वधे घोरे शिवस्य विजयाय च।
तदेव शूलिना दत्तं पुरा दुर्वाससे मुने॥
दुर्वाससा च यद् दत्तं सुचन्द्राय महात्मने।
अतिगुह्यतरं तत्त्वं सर्वमन्त्रौघविग्रहम्॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा मे पातु मस्तकम्।
क्लीं कपालं सदा पातु ह्रीं ह्रीं ह्रीमिति लोचने॥
ॐ ह्रीं त्रिलोचने स्वाहा नासिकां मे सदावतु।
क्लीं कालिके रक्ष रक्ष स्वाहा दन्तान् सदावतु॥
ह्रीं भद्रकालिके स्वाहा पातुमेऽधरयुग्मकम्।
ॐ ह्रीं ह्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा कण्ठं सदावतु॥
ॐ ह्रीं कालिकायै स्वाहा कर्णयुग्मं सदावतु।
ॐ क्रीं क्रीं क्लीं काल्यै स्वाहा स्कन्धं पातुसदा मम॥
ॐ क्रीं भद्रकाल्यै स्वाहा मम वक्ष: सदावतु।
ॐ क्रीं कालिकायै स्वाहा मम नाभिं सदावतु॥
ॐ ह्रीं कालिकायै स्वाहा मम पृष्ठं सदावतु।
रक्तबीजविनाशिन्यै स्वाहा हस्तौ सदावतु॥
ॐ ह्रीं क्लीं मुण्डमालिन्यै स्वाहा पादौ सदावतु।
ॐ ह्रीं चामुण्डायै स्वाहा सर्वाङ्गं मे सदावतु॥
प्राच्यां पातु महाकाली चाग्नेय्यां रक्तदन्तिका।
दक्षिणे पातु चामुण्डा नैर्ऋत्यां पातु कालिका॥
श्यामा च वारुणे पातु वायव्यां पातु चण्डिका।
उत्तरे विकटास्या चा-प्यैशान्यां साट्टहासिनी॥
पातूर्ध्वं लोलजिह्वा मायाऽऽद्या पात्वध: सदा।
जले स्थले चान्तरिक्षे पातु विश्वप्रसू: सदा॥
इति ते कथितं वत्स-सर्वमन्त्रौघ-विग्रहम्।
सर्वेषां कवचानां च सारभूतं परात्परम्॥
सप्तद्वीपेश्वरो राजा सुचन्द्रोऽस्य प्रसादत:।
कवचस्य प्रसादेन मान्धाता पृथिवीपति:॥
प्रचेता लोमेशश्चैव यत: सिद्धो बभूव हि।
यतो हि योगिनां श्रेष्ठ: सौभरि: पिप्पलायन:॥
यदि स्यात् सिद्धकवच: सर्वसिद्धीश्वरो भवेत्।
महादानानि सर्वाणि तपांसि च व्रतानि च॥
निश्चितं कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
इदं कवचमज्ञात्वा भजेत् कालीं जगत्प्रसूम्।
शतलक्षंप्रजप्तोऽपि न मन्त्र: सिद्धिदायक:॥
श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे तृतीये गणपतिखण्डे नारद-नारायण-संवादे भद्रकालीकवचम् ॐ तत्सत्॥

(11) कुल्लुका : “क्रीं हूं स्त्रीं फट्” मन्त्र को अपने शिखा स्थान पर स्पर्श करके 10 बार जपे।

(12) सेतु : "ॐ" मन्त्र को ह्रदय में हाथ रखकर 10 बार जपे।

(13) महासेतु : “क्रीं” मन्त्र को गले में हाथ रखकर 10 बार जपे।

(14) मुखशोधन : “क्रीं क्रीं क्रीं ॐ ॐ ॐ क्रीं क्रीं क्रीं”  7 बार बोलकर जपे ।

(15) अब मंत्रार्थ की क्रिया करे अर्थात देवी काली का शरीर और मन्त्र अभिन्न है यह चिंतन करें।

(16) निर्वाण : “अं क्रीं ॐ ऐं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लॄं एं ऐं ओं औं अं अः कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं ॐ” – १ बार नाभि को छूकर जपे ।

(17) प्राणयोग -“ह्रीं क्रीं ह्रीं” – ७ बार ह्रदय में जपे।

(18) दीपनी -“ॐ क्रीं ॐ” – ७ बार हृदय में जपे।

(19) निंद्रा भंग -“ईं क्रीं ईं” मन्त्र को हृदय में हाथ रखकर १० बार जपे ।

(20) अशौचभंग:- “ॐ क्रीं ॐ” – ७ बार ह्रदय में जपे।

(21) विनियोग : - 

आचमनी में थोड़ा जल लेकर बोले - 

ॐ अस्य श्री काली एकाक्षरी मन्त्रस्य भैरव ऋषिः उष्णिक् छन्द: श्री दक्षिणकालिका देवता कं बीजं ईं शक्ति: रं कीलकम् श्रीदक्षिणकालिका देवी प्रीतये चतुर्वर्ग सिद्धयर्थे जपे विनियोग:
 बोलकर जल छोड़ दे अब न्यास करे, मन्त्र बोलकर सम्बन्धित अंग को छुए :
ऋष्यादिन्यास - श्री महाकाल भैरव ऋषये नम: शिरसि । उष्णिक् छन्दसे नम: मुखे । ॐ श्रीदक्षिण-कालिका देवतायै नमः हृदये। कं बीजाय नम: गुह्ये (फिर हाथ धोए)। ईं शक्तये नम: पादयोः। रं कीलकाय नम: नाभौ। कालिका देवी प्रीतये चतुर्वर्ग सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नम: सर्वांगे।

(22) करन्यास : क्रां अंगुष्ठाभ्यां नम:। क्रीं तर्जनीभ्यां स्वाहा । क्रूं मध्यमाभ्यां वषट्। क्रैं अनामिकाभ्यां हूं। क्रौं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। क्र: करतल-करपृष्ठाभ्याम्  फट्।

(23) हृदयआदि न्यास : क्रां हृदयाय नम:। क्रीं शिरसे स्वाहा। क्रूं शिखायै वषट्।  क्रैं कवचाय हुम्। क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। क्र: अस्त्राय फट्।

(24) व्यापक न्यास:- “क्रीं” मन्त्र से 3 बार सिर से लेकर पैर तक पूरे शरीर के अंगों में स्पर्श करे

(25) अब हाथ जोड़कर माँ काली का ध्यान करे =
शवारुढ़ां महाभीमां घोरदंष्ट्रां वरप्रदाम्। हास्य युक्तां त्रिनेत्रां च कपाल कर्तृकाकराम्।
मुक्त केशी ललज्जिह्वां पिबंती रुधिरं मुहु:। चतुर्बाहुयुतां देवीं वराभयकरां स्मरेत्॥
(शव पर खड़ी महाविशालकाय भयानक दिखने वाली, वरदान देने वाली, तीन नेत्र वाली माँ जोर जोर से हंस रही हैं और उनके हाथ में कपाल (नरमुंड ) है | उनके बाल बिखरे हुए और जीभ बाहर निकालकर रुधिर पी रही हैं | चार हाथों वाली माँ का हम स्मरण करते हैं जो भक्तों को वरदान और अभयदान देने वाली हैं|)

(26) माँ काली का पूजन= 

 ॐ क्रीं कालिकायै नमः लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं कालिका देवी प्रीतये समर्पयामि । तिलक लगाए
ॐ क्रीं कालिकायै नमः हं आकाश-तत्वात्मकं पुष्पं कालिका देवी प्रीतये  समर्पयामि। फूल चढ़ाये
ॐ क्रीं कालिकायै नमः यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं कालिका देवी प्रीतये आघ्रापयामि। धूप दिखाए
 ॐ क्रीं कालिकायै नमः रं वह्नितत्वात्मकं दीपं कालिका देवी प्रीतये दर्शयामि। दीप दिखाए
 ॐ क्रीं कालिकायै नमः वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं कालिका देवी प्रीतये निवेदयामि। माँ को उत्तम नैवेद्य अर्पित करे
 ॐ क्रीं कालिकायै नमः सं सर्व-तत्त्वात्मकं सर्वोपचाराणि मनसा परिकल्प्य कालिका देवी प्रीतये समर्पयामि। फूल चढा दे

(27)इसके उपरान्त योनि मुद्रा द्वारा क्रीं नमः बोलकर प्रणाम करना चाहिए।

(28) उत्कीलन : देवता की गायत्री १० बार जपे।
“ॐ कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नोघोरा प्रचोदयात्।”

(29) जप:- यह मन्त्र एक लाख बार जप करने से सिद्ध होता है अर्थात कुल 1000 मालाएं जप करनी हैं
• सुझाव - 40 माला हर दिन जपे यानि 20 माला दिन में और 20 माला रात को जपे। 20 माला में 36 मिनट लग सकते हैं। इस तरह 4000 बार जप प्रतिदिन हो जाएगा। ऐसा 25 दिनों तक करना है तो (25दिन*40माला=1000 माला) एक लाख जप पूरा हो जाएगा|

(30) पुन: कुल्लुका, सेतु, महासेतु, आशौचभंग का जप :-
महासेतु= “क्रीं” मन्त्र को कंठ में 10 बार जपे
सेतु =“ॐ” मन्त्र को ह्रदय में 10 बार जपे
अशौचभंग= “ॐ क्रीं ॐ” – ७ बार हृदय में जपे
क्रीं से प्राणायाम करे = मन में ४ बार क्रीं जपकर नाक से श्वास अंदर को ले, अब १६ बार मन्त्र जपने तक श्वास को भीतर रोके रखे इसके बाद ८ बार जपते हुए श्वास बाहर निकाले।

(31) जपसमर्पण = 

एक आचमनी जल लेकर निम्न मंत्र पढ़कर सारा मन्त्र जपकर्म देवी के बायें हाथ में अर्पित कर दें -
ॐ गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि ॥ श्री

(32) क्षमायाचना
अपराधसहस्राणि क्रियंतेऽहर्निशं मया ।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि ॥१॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥२॥
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि ।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु मे ॥३॥

शक्राय नमः शक्राय नमः शक्राय नमः - बोलकर आसन के नीचे जल छिड़के और माथे पर लगाए फिर बोले - श्री विष्णवे नमः विष्णवे नमः विष्णवे नमः।

(33) पुरश्चर्या के अन्य अंग : जप तो उपरोक्त प्रकार से कर   ले| जिस दिन सारा जप पूर्ण हो जाए  "क्रीं कालीं नारिकेल बलिं समर्पयामि नमः" बोलकर काली माँ को नारियल तोड़कर सात्विक बलि के रूप में दे। हवन, तर्पण, मार्जन, ब्राह्मण भोजन भी करे -

सुझाव : 

 हवन : "क्रीं स्वाहा" मन्त्र से अग्नि में कुल दस हजार बार हवन घी द्वारा करने को कहा गया है। यानि 25 दिनों तक हर दिन 400 बार आहुति दे।

 तर्पण : "क्रीं नमः कालिकां तर्पयामि स्वाहा" बोलकर रोली-चन्दन-दूध-चीनी-फूल-तिल मिश्रित पानी(सम्भव हो तो गंगाजल) से कुल एक हजार बार कालिका देवी का तर्पण(अर्घ्य द्वारा या आचमनी से जल अर्पण) करें। यानि 25 दिनों तक हर दिन 40 बार तर्पण करें|

मार्जन : "क्रीं कालिका देवीं अभिषिंचामि नमः" बोलकर दूर्वा या कुश द्वारा कुल 100 बार  मार्जन(अपने मस्तक पर जल छिड़कना) करना है।

ब्राह्मण भोजन : 10 व्यक्तियों को भोजन कराए ये ब्राह्मण या सुहागिन औरतें भी हो सकती हैं। छोटी कन्याओं को तो अवश्य खिलाए। दक्षिणा भी देदे।

    यह पूजा तथा मन्त्र जप को किसी के सामने न करे अर्थात गोपनीय रखे। पुरश्चरण काल में ब्रह्मचर्य रखे, किसी भी स्त्री के लिए बुरा व्यवहार न करे इस बात का ध्यान रहे। कुछ ग्रंथों में इसका 2 लाख व 3 लाख बार जप करने को भी कहा गया है। इसलिए एक बार पुरश्चरण हो जाने पर यदि अच्छे स्वप्न आदि शुभ संकेत मिले तो सिद्धि मिलने तक साधक फिर से पुरश्चरण करता जाय। पुरश्चरण के बाद भी इस मन्त्र को हर दिन एक-दो माला जपे तो अच्छा है।

   देवी महाकाली भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रहों आदि के कारण उपजी हर प्रकार की बाधाएँ हर लेती हैं। अतः शिशु जैसा बनकर भक्ति भाव एवं सच्चे हृदय से काली माँ का ध्यान करते हुए माँ के मंत्रों का मानसिक जप करते रहना चाहिये। काली सहस्रनाम का सावधानीपूर्वक सच्चे हृदय से किया गया पाठ तुरन्त फल देने वाला होता है। इसके अलावा माँ काली के अष्टोत्तरशतनाम, अष्टक, कवच, हृदय आदि बहुत से सुंदर स्तोत्र हैं जिनका महाकाली की प्रीति हेतु पाठ किया जाना उत्तम है।

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