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शनिवार, 31 अक्तूबर 2020

bhoot pret badha nasak sidha shabar janjira

 भूत-प्रेत-बाधा-नाशक मन्त्र 


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ओर जाने इनके बारे मे:-

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कालि का आप्तकाम मन्त्र

 महा-काली बाँध मन्त्र 

प्रेत-जागृति व श्मशान-जागृति

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भूत-प्रेत-बाधा-नाशक मन्त्र 



 बिसमिल्ला रहमान रहीम । नमो सत्य नाम आदेश गुरू कुँ। 
आव आव मम्मम्दा पीर, दिल्ली के पीर । गढ़ गजनी के पीर, तुरकणी के पूत ! 
एक लाख असी हजार जजीर बँधो । बँधो भूत-प्रेत बंधो। वोत्तर चाल के परैत बँधो । 
सोल से हाक मार बँधो। चोस्ट योगनी बँधो। 
बावन वीर बँधो। नव से नारसिंह बँधो। छपन से कलवा बँधो। 
एक लाख मुसाण मुसाणियाँ कुं बँधो। चौरासी सिध बँधो । 
दानव बँधो, राक्षस बँधो, पीर बँधो। अष्ट कोट भैरव बँधो।
 रावण चॅडे, महरावण बँधो। चोरासी चाल के छल - छेपर - छाया बँधो। डाकणी-साकणी बँधो । 
जन्त्र-मन्त्र-तन्त्र कु बाँधो। द्रीठ-मुठ कु बँधो । भैंसासुर दानव कुं बाँधो । 
मम्मम्दा पीर, गढ़ गजनी के पातसाह, तुरकणी के पूत ! 
खेड़े-खेड़े बंधो, गाँव-दर-गांव बँधो। मुलक-दर-मुलक, देश - परदेश बँधो। 
या गांव की शीव बँधो। या गाँव नखासा समेत चहु खुण बँधो । 
या भोला की गली कुञ्चली बंधो। या घर का नीकास समेत आगा-पीछा बंधो ।
 या घर का बांया-दाहिणा बँधो । या घर का चाउ खुण बँधो । 
ये मानवी का पीण्ड बँधो। ईश मानवी का पीण्ड में छल-छेदर-छाया बंधो । 
बेग बंधो, बंधो मम्मम्दा पीर, गड गजनी के पातसाह, तुरकणी के पूत ! 
एक लाख अस्सी हजार जजीर बँधो। एक लाख अस्सी हजार पीर आग चलै । 
एक लाख अस्सी हजार पीर पीछ चलै । एक लाख अस्सी हजार पीर दस्त पर चलै ।
 एक लाख अस्सी हजार पीर दीस्त चुर चलै । वेग चलै, हमारा चलाया वेग चले। 
मम्मम्दा पीर, गढ़ गजनी के पातसाह, तुरकणी के पूत ! 
एक लाख अस्सी हजार पीर ओर मका-मदीना सु चढे । एक लाख अस्सी हजार पीर ओर त्रीया राज सु चढे । 
एक लाख अस्सी हजार पीर ओर पीछिम देश सु चढ़े। एक लाख अस्सी हजार पीर ओर कावरू सु या वेग काडो। 
हमारा कडाया वेग न काडो, तो दुहाई खुदा कीर खुदा की, रसूल की। 
हमारा कडाया वेग काडो। हमारा कडाया वेग न काडो, तो दुहाई भानु सुलतान की।
 हमारा कडाया वेग काडो। हमारा कडाया वेग न काडो, तो दुहाई सलेमान पेगम्बर' की। 
हमारा कडाया वेग काडो। हमारा कडाया वेग न काडो, तो दुहाई सैयद अहम्मद पीर की। 
हमारा कडाया वेग काडो। हमारा कडाया वेग न काडो, तो दूहाई 
एक लाख अस्सी हजार सहवा की ईल्ला ईल्लाह ईल्लीलाह मम्मम्द रसुलुला है।

विधि : उक्त जजीरा मन्त्र को वृहस्पतिवार से आरम्भ कर 41 दिन नित्य 101 बार पश्चिमाभिमुख होकर जपे । लोबान का धूप दे। ब्रह्मचारी रहे। 41दिन के जप के आदि और अन्त में सवा पाव चावल, सवा पाव शक्कर, सवा पाव घी का मलीदा चढ़ाकर फकीर को दे । इससे मन्त्र सिद्ध हो जाएगा। फिर आवश्यकतानुसार प्रयोग करे।


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